daily News

Day 4 सिंधु घाटी सभ्यता

 भूमिका

सिंधु घाटी सभ्यता (पश्चिमी उत्तर भारत)  
             (हड़प्पा सभ्यता, सरस्वती सभ्यता, प्रथम नगरीय सभ्यता, कांस्य युगीन सभ्यता- सिंधु घाटी सभ्यता के अन्य नाम है।)
सरस्वती सभ्यता- माना जाताा है कि सिंधु नदी और गंगा नदी के बीच सरस्वती नदी बहती थी इसे किनारे बहुत से अस्तर मिले हैं इसलिए इसेे सरस्वती सभ्यता भी कहा जाता है।

प्रथम नगरीय सभ्यता- हड़प्पा सभ्यता में पक्केे ईटो का प्रयोग हुआ है। तथा ये इटें विभिन्न आकार के थे। नगर योजना नली विकास सड़क सुरक्षाा सभी उच्च कोटि के थे इस प्रकार भारत में पहली बार नगरों का निर्माण हड़प्पाा सभ्यता हुआ था।

कांस्य युगीन सभ्यता- तांबा + टीना=कांस्य, हड़प्पा सभ्यता मेंं कांसे से का प्रयोग बहुत ज्यादा था। इसलिए इसेे कांस्य सभ्यता कहते हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता- इस सभ्यता के आरंभिक और से सिंधु नदी की घाटीी से प्राप्त, अतः इसे सिंंधु घाटी की सभ्यता का नाम दिया गया।

हड़प्पा सभ्यता- जब बाद में देश के अन्य भागों- लोथल (गुजरात), कालीबंगा (राजस्थान), रोपड़ (पंजाब), बनवाली (हरियाणा ), आलमगीरपुर (उत्तर प्रदेश )आदि स्थानों से इस सभ्यता केेेेे अवशेष मिले तो विद्वानों नेेे इसे "हड़प्पा सभ्यता" का नाम दिया।
हड़प्पा सभ्यता इसलिए कहा जाता है क्योंकि सबसे पहले हड़प्पा स्थान की खोज की गई थी।
नोट:- सिंधु और गंगा नदी के बीच 1110 स्थल पाए गए हैं।


सिन्धु सभ्यता से सम्बंधित महत्वपूर्ण वस्तुएं
महत्वपूर्ण वस्तुएंप्राप्ति स्थल
तांबे का पैमानाहड़प्पा
सबसे बड़ी ईंटमोहनजोदड़ो
केश प्रसाधन (कंघी)हड़प्पा
वक्राकार ईंटेंचन्हूदड़ो
जुटे खेत के साक्ष्यकालीबंगा
मक्का बनाने का कारखानाचन्हूदड़ो, लोथल
फारस की मुद्रालोथल
बिल्ली के पैरों के अंकन वाली ईंटेचन्हूदड़ो
युगल शवाधनलोथल
मिटटी का हलबनवाली
चालाक लोमड़ी के अंकन वाली मुहरलोथल
घोड़े की अस्थियांसुरकोटदा
हाथी दांत का पैमानालोथल
आटा पिसने की चक्कीलोथल
ममी के प्रमाणलोथल
चावल के साक्ष्यलोथल, रंगपुर
सीप से बना पैमानामोहनजोदड़ों
कांसे से बनी नर्तकी की प्रतिमामोहनजोदड़ों

 

सिन्धु सभ्यता के प्रमुख स्थल व खोजकर्ता
स्थलअवस्थितिखोजकर्तावर्षनदी / सागर तट
हड़प्पामांटगोमरी (पाकिस्तान)दयाराम साहनी1921रावी
मोहनजोदड़ोलरकाना (पाकिस्तान)राखालदास बनर्जी1922सिन्धु
रोपड़पंजाबयज्ञदत्त शर्मा1953सतलज
लोथलअहमदाबाद (गुजरात)रंगानाथ नाथ राव1954भोगवा नदी
कालीबंगागंगानगर (राजस्थान)ए. घोष1953घग्घर
चन्हूदड़ोसिंध (पाकिस्तान)एन. जी. मजूमदार1934सिन्धु
सुत्कांगेडोरबलूचिस्तान (पाकिस्तान)आरेल स्टाइन1927दाश्क
कोटदीजीसिंध (पाकिस्तान)फज़ल अहमद खां1955सिन्धु
अलमगीरपुरमेरठयज्ञदत्त शर्मा1958हिंडन
सुरकोटदाकच्छ (गुजरात)जगपति जोशी1967
रंगपुरकठियावाड़ (गुजरात)माधोस्वरूप वत्स1953-54मादर
बालाकोटपाकिस्तानडेल्स1979अरब सागर
सोत्काकोहपाकिस्तानअरब सागर
बनवालीहिसार (हरियाणा)आर. एस. बिष्ट1973-74
धौलावीराकच्छ (गुजरात)जे.पी. जोशी1967
पांडाजम्मू-कश्मीरचिनाब
दैमाबादमहाराष्ट्रआर. एस. विष्ट1990`प्रवरा
देसलपुरगुजरातके. वी. सुन्दराजन1964
भगवानपुराहरियाणाजे.पी. जोशी
          


                   सिंधु घाटी सभ्यता की उत्पत्ति
सिंधु घाटी सभ्यता का कार्यक्रम:
फादर एच हे रास- 6000 ई०पू०
सर जॉन मार्शल- 3250-2750 ई०पू० 
माधोस्वरूपवत्स- 3500-2700ई०पू०
अर्नेस्ट मैके महोदय- 2800-2500 ई०पू०
रेडियो कार्बन एक विधि के हिसाब से- 2350-1750 ई०पू०
फेयर सर्विस- 2000 से 1500ई०पू०
DP अग्रवाल -2300-1700ई०पू०

सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार :
क्षेत्र विस्तार:
स्वतंत्रता से पहले हड़प्पा सभ्यता के 40 स्थलों की खोज हुई थी। स्वतंत्रता के बाद वर्तमान समय तक 1400 स्थलों की खोज की गई है।
अफगानिस्तान- 2 स्थाल 
         a) मुंण्डीगाक    b) शुर्तघुई
पाकिस्तान- 475 स्थाल
       बलूचिस्तान, सिंध प्रांत, पंजाब
भारत - 925 स्थल
         पंजाब, हरियाणा, गुजरात, जम्मू एंड कश्मीर, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र,
  • गुजरात में भारत के हड़प्पा कालीन सभ्यता के सबसे ज्यादा स्थल है।
  • महाराष्ट्र में प्रवर नदी, नर्मदा नदी की सहायक नदी। प्रवर नदी के तट पर दायमाबाद स्थित है।
महत्वपूर्ण स्थल और विशेषताएं
नगर-
१. हड़प्पा
२. मोहनजोदड़ो
३. लोथल
४. धोलावीरा
५. कालीबंगा
६. चन्हूदरो
७. बनवाली
           सारे नगर दो भाग में बैठे हुए थे। १. पूर्वी टीला २. पश्चिमी टीला
१. पूर्वी टीला- अधिकांश निवासी इसी टीले पर रहते थे। यानी चला स्थान पर स्थित था।
२.पश्चिमी टीला- चार दीवारों से गिरा था। यह ऊंचाई पर स्थित था। चारदीवारी से गिरा हुआ था। बाहर से पक्की ईटो से घिरा हुआ था तथा अंदर से कच्चे ईटो से घिरा हुआ था।

१. हड़प्पा सभ्यता

                 
पंजाब (पाकिस्तान) रावी  नदी के हवाई किनारे पर स्थित है। खोज तथा 1921 में उत्खनन किया जाने वाला यह प्रथम सिंधु स्थल है। इस सभ्यता के नाम पर सिंधु सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता कहा जाता है।
    हड़प्पा के विस्तार किले की जानकारी सर्वप्रथम मैसन 1826 में दी तथा कनिंघम ने 1853 एवं 1873 मैं यहां का दौरा किया लगभग 60 वर्ष बाद एम एस वत्स मैं निर्देशन में 1921 से 1934 के बीच यहां उत्खनन हुआ।
     यहां का धान कोठार, नगर दुर्ग क्षेत्र से बाहर लेकिन इससे सटे हुए, पश्चिम में अवस्थित है या छह धान को धारों वाली ईद के चबूतरो की दोष श्रृंखला है तथा प्रत्येक की मां 50×20 फीट है। यह नदी के काफी नजदीक है तथा जल परिवहन द्वारा इसमें आपूर्ति की जाती है।
      दान कोठार के दक्षिण में ईद के गोल चबूतरे की कतार बनी है जिस पर अनाजों की धुनाई होती थी।
       नगर दुर्ग की दीवार के ठीक नीचे एक अच्छे कमरों के बैठक बने हुए हैं, जिसमें संभवत मजदूर रहते थे।

२. मोहनजोदड़ो
(सिंधु नदी के किनारे पर बसा हुआ है)

यह सिंधु सभ्यता के शहरों में सबसे बड़ा है।
मोहनजोदेड़ो सिंधी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'मुर्दों का टीला'। इसे 'मुअन जो दड़ो' भी कहा जाता है। चार्ल्स मैसन ने सर्वप्रथम हड़प्पा के विशाल टीलों की ओर ध्यान आकृष्ट किया था। मोहनजोदाड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का एक नगर है ।
पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के लरकाना जिले में सिंधु नदी के बाएं तट पर स्थित, 1921  में राखालदास बनर्जी (आर.डी. बनर्जी) के नेतृत्व में उत्खनन आरम्भ हुआ। मोहनजोदड़ो का मतलब है मुर्दों का टीला अथवा माउंट ऑफ़ डेथ। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के बीच 482 किलोमीटर का फासला  है। लेकिन यहां भी हड़प्पा जैसी नगर योजना है। विशाल अन्न-भंडार मिला है। बार्ली अथवा जौ जैसे अनाज मिले हैं। टेरीकोटा का बना दाढ़ीवाला पुरोहित, सील – जिस पर उभरी आकृति को ‘पसुपति’ कहा गया है। और नृत्यमुद्रा में एक लड़की की मूर्ति, जो ब्रॉन्ज यानि कांसे की बनी है, यहां मिली है। एक सील पर एक ऐसे पशु-मनुष्य जिसका पिछले हिस्सा जानवर का है, क्योंकि उसमे पूंछ है। और अगला हिस्सा मनुष्य का है। और वह एक बाघ से दोनों हाथों से मुस्तक-प्रहार कर रहा है। दोनों भिड़े हुए हैं। अचंभित करने वाली बात यह भी है कि यह तय करना मुश्किल है कि आधा हिस्सा नर का है या मादा का। क्योंकि इसमें स्तन भी है और दाढ़ी भी। सील काफी संख्या में मिले है (लगभग एक हजार दो सौ), इसलिए अनुमान किया जाता है कि यह एक बड़ा व्यापार केंद्र था। कपास-रुई के अवशेष भी मिले हैं। इन सबके अलावा यहां इक्कीस मानव कंकाल भी मिले हैं, लेकिन कब्रिस्तान जैसी स्थिति के कोई सबूत नहीं हैं।  
      मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार सर्वप्रथम महत्वपूर्ण आम इमारत है इसकी मां 29 फीट लंबा×23 फीट चौड़ा×8 फीट गहरा है।

                                    स्नानागार

३. लोथल (गुजरात)
        (खंभात की खाड़ी में सिर पर है)

लोथल एक प्राचीन टीला है, जो अहमदाबाद जिले के ढोलका तालुका के सरगवाला गाँव में है। लोथल शब्द का शाब्दिक अर्थ है “मृतकों का स्थान”। इस स्थल की खुदाई डॉ एस.आर. राव ने 1955-62 ने हड़प्पा शहर (लगभग 2500-1900 ईसा पूर्व) के कई संरचनात्मक अवशेषों का पता लगाया।

पूरी बस्ती को एक गढ़ या एक्रोपोलिस और निचले शहर में विभाजित किया गया था, जो पश्चिमी तरफ 13 मीटर मोटी मिट्टी की ईंट की दीवार से बाढ़ से सुरक्षित थे। प्रमुख एक्रोपोलिस में रहते थे, जहां 3 मीटर ऊंचे प्लेटफार्मों पर मकान बनाए गए थे और सभी पवित्र सुविधाओं सहित पक्के स्नानघर, भूमिगत नालियां और पीने योग्य पानी के लिए एक कुआं प्रदान किया गया था। निचला शहर दो क्षेत्रों में विभाजित था। मुख्य वाणिज्यिक केंद्र जिसमें शिल्पकार रहते थे और अन्य आवासीय क्षेत्र है। सबसे उत्कृष्ट अवशेष एक बड़े टैंक हैं जिसे डॉक और गोदाम के रूप में पहचाना जाता है।

डॉकयार्ड ठीक ईंटों से बना है और सबसे वैज्ञानिक रूप से पानी के प्रवाह को बाहर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, ताकि वर्तमान और पानी के जोर का सामना किया जा सके।

अन्य महत्वपूर्ण संरचना, गोदाम गढ़ के दक्षिण पश्चिम कोने में स्थित है। यह 3.5 मीटर ऊंचे मंच पर खड़ा है और 49 x 40 मीटर मापता है। मूल रूप से कार्गो की सुरक्षा के लिए लकड़ी के चंदवा प्रदान करने के लिए मंच पर मिट्टी के ईंटों के 64 घन ब्लॉक मौजूद थे।

हड़प्पा लोथल में न केवल एक समृद्ध कपास और चावल उगाने वाले घास के मैदान के साथ, बल्कि इसके मनके बनाने वाले उद्योग द्वारा भी लोथल के प्रति आकर्षित थे। इसके अलावा बस्ती के पश्चिमी किनारे पर एक नदी थी जो पहाड़ी क्षेत्र से कैम्बे की खाड़ी तक पहुँच प्रदान करती थी। इस छोटे से शहर की समृद्धि पश्चिम एशिया के साथ अर्द्ध कीमती पत्थर के मोती, तांबे, हाथी दांत, खोल और कपास के सामान के विदेशी व्यापार पर निर्भर करती थी।

फारस की खाड़ी के मूल की एक मुहर, गोरिल्ला और ममी की टेराकोटा मूर्तियों जैसी कई वस्तुओं की खोज लोथल के एक मजबूत विदेशी संपर्क को इंगित करती है।

शहर लगभग 1900 ईसा पूर्व में लगातार बाढ़ से नष्ट हो गया था और 1700 ईसा पूर्व में हड़प्पा द्वारा पूरी तरह से छोड़ दिया गया था।

पुरावशेषों की संख्या के दृष्टिकोण से, लोथल भारतीय सीमाओं के भीतर खुदाई करने वाले सबसे अमीर हड़प्पा स्थल में से एक है। हड़प्पा संस्कृति का एक विस्तृत स्पेक्ट्रम खुदाई के दौरान सामने आई भौतिक चीज़ों से हो सकता है, जो पुरातत्व संग्रहालय में संरक्षित और प्रदर्शित हैं, जो 1976 में स्थापित किया गया था।

संग्रहालय में तीन गैलरी हैं। सामने की गैलरी में, लोथल के हड़प्पा शहर के एक कलाकार अनुमान विचार का कैनवास प्रदर्शित किया गया है। लोथल के महत्व को समझने में आगंतुकों की मदद करने के लिए परिचयात्मक लेखन अप और नक्शे भी हैं। बाईं ओर गैलरी में मोतियों, टेराकोटा गहने, मुहरों की प्रतिकृतियां और सीलिंग्स, खोल, हाथी दांत, तांबे और कांस्य की वस्तुओं, उपकरण और मिट्टी के बर्तन के साथ शोकेस हैं। दाईं ओर गैलरी में गेम ऑब्जेक्ट्स, पशु और मानव मूर्तियाँ, वज़न, चित्रित मिट्टी के बर्तनों, लघु मिट्टी के बर्तन, ईंटें, दफनाने और अनुष्ठान की वस्तुओं के अलावा, एक संयुक्त दफनाने और लोथल साइट के एक स्केल मॉडल की प्रतिकृति है।


शेल ऑब्जेक्ट्स: गुजरात का तट शेल में बहुत समृद्ध है, जिसका उपयोग चूड़ियों, मोतियों, खेलों और अन्य वस्तुओं को बनाने के लिए किया गया था।

तांबा और कांस्य वस्तुएं: हड़प्पावासी तांबे और कांस्य की वस्तुओं का निर्माण करते थे। लोथल के हड़प्पा वासियों ने संभवत: ओमान के स्रोतों से तांबा का आयात किया। उपकरण: खुदाई से बरामद किए गए पत्थर के ब्लेड, हड्डी के बिंदु, स्पिंडल-व्होरल, प्लम बोब्स आदि जैसे उपकरण प्रदर्शन पर हैं।

मिट्टी के बर्तन: हड़प्पा के बर्तन अत्यधिक उपयोगी हैं।

गेम्स ऑब्जेक्ट्स: गेम ऑब्जेक्ट्स जैसे मार्बल्स, हॉप्सकॉच, स्पिनिंग टॉप्स, डाइस और गेम्समैन भी बरामद और प्रदर्शित होते हैं। उनमें से कुछ खिलौना-गाड़ी से जुड़े थे जो मॉडल की मदद से प्रदर्शित किए जाते हैं।

पशु और मानव मूर्तियाँ: लोथल हड़प्पावासी जानवरों की संख्या और कुछ मानव टेराकोटा मूर्तियाँ बनाते थे। उनमें, एक ममी, गोरिल्ला और एक सुमेरियन जैसे सिर दिलचस्प हैं।

वज़न और माप: हड़प्पा वासियों ने एक मानकीकृत भार प्रणाली विकसित की। वज़न विभिन्न पत्थरों जैसे- कारेलियन, जैस्पर, अगेट आदि से विभिन्न आकृतियों में बना होता है। उन्होंने सीमांकन के साथ हाथी दांत का भी पैमाना बनाया।

दफन और अनुष्ठान वस्तुएँ: हड़प्पावासी मृतकों के साथ मिट्टी के बर्तन, मोतियों और आजीविका की अन्य वस्तुओं को जमा करते थे। संयुक्त दफन की खुदाई लोथल के लिए अद्वितीय है।


४. धोलावीरा(गुजरात)

नवीनतम उत्खनित शहर  कच्छ जिला में है। तथा सिंधु सभ्यता के विशालतम शहरों में से एक है।हालांकि इस पर पहले जे. पी. जोशी का ध्यान गया पर इस स्थान पर विस्तृत उत्खनन आर एस विशिष्ट तथा उसके दल ने 1990-91 में किया।

तीन दूसरों की सबसे आम विशेषताएं जैसे की नगर योजना ग्रिड प्रणाली जल निकासी प्रणाली तथा विस्तृत घेराबंदी यहां पाई गई है।

यहां की विशिष्ट विशेषता यह है कि यह अन्य शहरों की तरह दो नहीं तीन भागों में बांटा है इसके दो भागों की मजबूत घेराबंदी की गई थी।

यहां दो आंशिक आते हैं- पहला नगर दुर्ग (जहां  संभवत: उच्चतर स्तर का निवास था) मैं तथा दूसरे मध्य नगर (जहां संभवत शासकों के निकट संबंधी व अन्य अधिकारी रहते थे) में। निम्न शहर से अलग इस मध्य शहर का अस्तित्व यहां की खास विशेषता है।

 धोलावीरा शहर की विशेषता उसके बंदरगाह की वजह से थी। बंदरगाह से संचालित उसके समुद्र मार्ग द्वारा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार धोलावीरा की प्रमुखता की खास वजह थी। धोलावीरा सिंधु घाटी की सभ्यता से कालका भारत में दूसरा सबसे बड़ा अवशेष है एवं इकलौता स्थान है जहां प्राचीन काल का सबसे बड़ा बंदरगाह का प्रमाण मिला है।https://www.google.com/amp/s/hindi.gktoday.in/gk-in-hindi/%25E0%25A4%25A7%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25B2%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B5%25E0%25A5%2580%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25BE-%25E0%25A4%2597%25E0%25A5%2581%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A4/amp/


५. कालीबंगा(राजस्थान)

घग्गर नदी के किनारे था यह नदी सैकड़ों वर्ष पहले सो गई।

या दो सिंधु शहरों में से एक है। जहां से आधे हड़प्पा तथा हड़प्पा संस्कृति संस्तर प्राप्त हुए हैं आधे हड़प्पा चरण में खेत ज्योति जाते थे। लेकिन हड़प्पा काल में उन्हें जोता नहीं जाता था बल्कि खुद आ जाता था।

नगर दुर्ग तथा शहर के चारों और विशाल ईद के दीवार के अवशेषों के चिन्ह प्राप्त हुए हैं। नगर दुर्ग में पुरातात्त्विक विदों ने दो चबूतरे खोजे हैं जो यह करने के कामआते होंगें। 

  • सभ्यता मात्री प्रधान थी।
  • इस सभ्यता की सड़के समकोण पर काट दी थी।
  • घर के दरवाजे व खिड़कियां मुख्य सड़क की और ना खुलकर पीछे की ओर खुलती थी।
  • इसकी खाद्य फसलें गेहूं और जो थी। जो मिश्रित रूप से बोली जाती थी।
  • जूते हुए खेत, सेल चिकित्सा, कपास के साथ साक्षय प्राप्त हुए हैं।

इस सभ्यता के लोग शव के साथ दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुएं रखते थे।

६. चन्हूदरो(सिंध)
               सिंधु नदी के बाएं किनारे पर है तथा यह मोहनजोदड़ो से लगभग 130 किलोमीटर दक्षिण में है।
यह एकमात्र सिंधु शहर है। जिसमें नगर दुर्ग नहीं है मोहनजोदड़ो की तरह यहां भी कई बार बाढ आने के चिन्ह है। यहां से एक छोटा पात्र प्राप्त हुआ है जो संभवत: एक दवात था। बारिश के बारे में कुछ निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है। पुरातात्विक विदों मैं यहां से धातु कर्मियों सीपी के आभूषण निर्माताओं तथा मकान निर्माताओं की दुकान खोली है। (सोना, चांदी, टीम, तांबा आदि धातुओं का प्रयोग होता था)।
यह क्षेत्र पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के मोहेंजोदड़ो से दक्षिण में स्थित है। यहाँ पर 4000 से 1700 से ईशा पूर्व में बसा हुआ माना जाता है और इस स्थान को इंद्रगोप मनकों के निर्माण स्थल के रूप में जाना जाता है। चन्हुदड़ो की पहली बार खुदाई मार्च १९३० में एन॰जी॰ मजुमदार ने करवाई और उसके बाद 1935-36 में अमेरीकी स्कूल ऑफ़ इंडिक एंड इरानियन तथा म्यूज़ियम ऑफ़ फाइन आर्ट्स, बोस्टन के दल ने अर्नेस्ट जॉन हेनरी मैके के नेतृत्व में करवाई। 
७. बनवाली(हरियाणा)
         विलुप्त सरस्वती नदी के किनारे पर था। यहां से आधेे हड़प्पा तथा हड़प्पाा संस्कृति के चरण प्राप्त हुुए हैं। सिंधुु सभ्यता के शहरों के सभी आम लक्षण, जैसेे कि नगर योजना, ग्रिड प्रणाली, जल निकास प्रणाली तथा अन्य यहां से प्राप्त  हुए हैं।

No comments