सांख्यकारिका (ईश्वरकृष्ण) श्लोक और अनुवाद
25 तत्वों की चर्चा।
( साङ्ख्यप्रतिपादित्त ज्ञान की उपादेयता )
दुखत्रयाऽभिघाताज्जिज्ञासा तदभिघातके हेतो।
दृष्टे साऽपार्था चेन्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात्।।१।।
अनुवाद- आध्यात्मिक, आधिदैविक, अधिभौतिक यह तीन प्रकार केेे दुखों का अभी रात होने से उनको दूर करने के हेतु में जिज्ञासा होती है। जिससेे प्रत्यक्ष उपाय होने पर वह व्यर्थ है यह कथन उचित नहीं है। क्योंकि लिस्ट उपाय से एकांतिक और आत्यंतिक दुख की निवृत्ति होती है।
(वैदिक उपायों की अनुपादेयता)
दृष्टवदानुश्रविक: से ह्यविशुध्दिक्षयातिशययुक्त:।
तव्दिपरीत: श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानत्।।२।।
अनुवाद- वैदिक उपाय यज्ञादि भी प्रत्यक्ष की तरह ही हैै। क्योंकि वह भी अशुद्धि क्षयतिशय दोष से युक्त है अतः उससे विपरीत व्यक्त अव्यक्त और ज्ञ का विज्ञान रूपी उपाय ही श्रेष्ठ कर है इसी उपाय से तीनोंं प्रकार के दुखों से एकांतिक और अत्यंतिक निवृत्ति संभव हैै।
(प्रमेयभूत 25 तत्वों का परिचय)
मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतिय: सप्त।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृति: पुरुष:।।३।।
अनुवाद:- मूल प्रकृति अविकृति है महत् आदि 7 प्रकृति और विकृति है, 16 केवल विकार हैं पुरुष ना तो प्रकृति है ना ही विकृति है।।
(त्रिविध प्रमाण)
दृष्टमनुमानमाप्तवचनं च सर्वप्रमाणसिद्धात्वात्।
त्रिविधं प्रमाणमिष्ट, प्रमेयसिद्धि: प्रमाणाध्दि।।४।।
अनुवाद:- सांख्य के मत में प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्त वचन ये तीन ही प्रमाण है, इन्हीं में ही सभी प्रमाण सिद्ध हो जाते हैं। व्यक्त्, अव्यक्त और ज्ञ सभी प्रमाण तीनों प्रमाणों से ज्ञात होतेे हैं ।।
(तीनों प्रमाणों का लक्षण)
प्रतिविषयाऽध्यवसायो दृष्ट, त्रिविधमनुमानमाख्यातम्।
तल्लिङ्ग - लिङ्गि पूर्वकमाप्तश्रुतिराप्तवचनन्तु।।५।।
अनुवाद:- श्रोत, चक्षुषु आदि इंद्रियों से होने वाला ज्ञान प्रत्यक्ष है, अनुमान तीन प्रकार का होता हैै(पूर्ववत्, शेेषवत् और सामान्यतो) और हुआ लिंग (हेतुु)पूर्वक होता है या अलिङग् (साध्य)पूर्वक। आप्त श्रुति आप्तवचन प्रमाण है।
(प्रमाणों का उपयोग)
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