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मेघदूत श्लोक

 मेघदूतम श्लोक-      

    प्रश्न पत्र-२ (upsc)    खण्ड- ख  वर्ग-३

श्लोक नंबर 1
   कश्चित्‍कान्‍ताविरहगुरुणा स्‍वाधिकारात्‍प्रमत:
    शापेनास्‍तग्‍ड:मितमहिमा वर्षभोग्‍येण भर्तु:।
यक्षश्‍चक्रे जनकतनयास्‍नानपुण्‍योदकेषु
     स्निग्‍धच्‍छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।1।।

अन्वय:-  
स्‍वाधिकारात् प्रमत: कान्‍ताविरहगुरुणा वर्षभोग्‍येण भर्तु:
शापेन अस्तग्‍ड:मितमहिमा कश्चित यक्षो 
जनकतनयास्‍नानपुण्‍योदकेषु स्निग्‍धच्‍छायातरुषु
रामगिर्याश्रमेषु वसतिं चुके।

हिंदी अनुवाद:- अपने काम में प्रसाद करने से प्रिया के विरहसे दु:सह और 1 साल तक अनुभव किए जानेे वाले स्वामी के शाप से महत्वहीन होकर किसी यक्ष ने सीता जी केेेे स्नान से पवित्र जल वालेे तथा घने छायादार वृक्षोंं से युक्त रामगिरी  के आश्रमों में निवास किया।

श्लोक नंबर 2
तस्मिन्‍नद्रो कतिचिदबलाविप्रयुक्‍त: स कामी
      नीत्‍वा मासान्‍कनकवलयभ्रंशरिक्‍त प्रकोष्‍ठ:
आषाढस्‍य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्‍टसानु
      वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।2।।

अन्वय:- 
तस्मिन् अद्रो अबलाविप्रयुक्‍त: कनकवलयभ्रंशरिक्‍त प्रकोष्‍ठ: कामी स कतिचित् मासान् 
नीत्‍वा आषाढस्‍य प्रथमदिवसे अश्लिष्‍टसानुं वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं 
मेघं ददर्श।

हिंदी अनुवाद:-  
उस पर्वत पर प्रिया के वियोग से दुर्बल होने के कारण सुवर्ण कक्ड़ण के गिरने से शून्य कलाई वाले पूर्वोत्तर कामुक या छोड़ने 8 मास बिताकर आषाढ़ के पहले दिन में पहाड़ की चोटी से समृद्ध और वप्रक्रिडा में तिरछा दंत प्रहार करने वाले हाथी के दृश्य मेघ को देखा।

श्लोक नंबर 3
तस्‍य स्थित्‍वा कथमपि पुर: कौतुकाधानहेतो-
     रन्‍तर्वाष्‍पश्चिरमनुचरो राजराजस्‍य दध्‍यौ।
मेघालोके भवति सुखिनो
प्‍यन्‍यथावृत्ति चेत:
     कण्‍ठाश्‍लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्‍थे।।3।।

अन्वय:- 
राजराजस्‍य अनुचार: अंतर्बाष्प: कौतुकाधानहेतो: तस्य 
पूर: कथमपि स्थित्‍वा चिरं दध्यौ। मेघालोके सुखिन: अपि
चेत: अन्‍यथावृत्ति भवति,कण्‍ठाश्‍लेषप्रणयिनि जने र्दूरसंस्‍थे
किं पुन:?

हिंदी अनुवाद:- 
कुबेर के भृत्य ने आंसू रोक कर उत्कंठा की उत्पत्ति करने वाले उस मेघ के सामने बड़े कष्ट से रहकर बहुत समय तक चिंता की। जब मेघ का दर्शन होने पर सुखी का चित्त भी विकृत हो जाता है तो कंठ में आलिंगन करने की इच्छा रखने वाली प्रिया के दूर रहने पर फिर क्या कहना है?

श्लोक नंबर 4
प्रत्‍यासन्‍ने नभसि दयिताजीवितालम्‍बनार्थी
      जीमूतेन स्‍वकुशलमयीं हारयिष्‍यन्‍प्रवृत्तिम्।
स प्रत्‍यग्रै: कुटजकुसुमै: कल्पितार्घाय तस्‍मै
      प्रीत: प्रीतिप्रमुखवचनं स्‍वागतं व्‍याजहार।।4।।

अन्वय:- 
स नभसि प्रत्‍यासन्‍ने दयिताजीवितालम्‍बनार्थी
जीमूतेन स्‍वकुशलमयीं प्रवृत्तिम् हारयिष्‍यन्
प्रत्‍यग्रै: कुटजकुसुमै: कल्पितार्घाय तस्‍मै
 प्रीत: प्रीतिप्रमुखवचनं स्‍वागतं व्‍याजहार।

हिंदी अनुवाद:- 
सावन मास के निकट होने पर प्रिया की जीवन रक्षा चाहने वाले उसी रचने में एक द्वारा अपने कुशल वार्ता भेजने की इच्छा से गिरी मल्लिका पुष्पों से मैं की पूजा कर प्रसन्नता प्रणय भरे मयनों से उसका स्वागत किया।



श्लोक नंबर 5
धूमज्‍योति:सलिलमरुतां संनिपात: क्‍व मेघ:?
      संदेशार्था: क्‍व पटुकरणै: प्राणिभि: प्रापणीया:?।
इत्‍यौत्‍सुक्यादपरिगणयन्‍गुह्यकस्‍तं ययाचे
      कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्‍चेतनाचेतनुषु।।

अन्वय:- 
धूमज्‍योति:सलिलमरुतां संनिपातो मेघ: क्‍व
प्रापणिभि: प्रापणीया:संदेशार्था: क्‍व?
इति औत्सुक्यात् अपरिगणयन् गुह्यक: तं
ययाचे; हि कामाऽर्ता चेतनाचेतनुषु प्रकृतिकृपणा:।

हिंदी अनुवाद:- 
कहां तो धुंआ, तेज, जल और वायु के समुदाय से उत्पन्न जड़ मेघ और कहां कुशल इंद्रियों से युक्त प्राणियों से भेजे जाने वाले संदेश के वचन? उत्कण्ठाके कारण इस बात का विचार न कर यक्ष ने मेघ से याचना की, क्योंकि काम से कुल जन और चेतन और अचेतनो के विवेक में स्वभाव से दीन हो जाते हैं।

श्लोक नंबर 6
जातं वंशे भुवनविदिते पुष्‍करावर्तकानां
      जानामि  त्‍वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोन:।
तेनार्थित्‍वं त्‍वयि विधिवशादूरबन्‍धुर्गतो हं
      याच्
ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्‍धकामा।।6।।

अन्वय:- 
त्‍वां भुवनविदिते पुष्‍करावर्तकानां वंशे जातं
कामरूपं मघोन: प्रकृतिपुरुषं जानामि।
 तेज विधिवशादूरबन्‍धु: अहं त्‍वयि अर्थित्‍वं गत:।
अधिगुणे याच्ञा मोघा अपि वरम्, अधमे 
लब्‍धकामा अपि न।।


हिंदी अनुवाद:- 
हे मेघ! मैं जानता हूं कि तुम लोकविख्यात पुष्कर और आवर्तक नाम वाले मेघों के कुल में उत्पन्न और अपनी इच्छा के अनुसार रूप लेने वाले तथा इंद्र के प्रधान पुरुष हो। इस कारण से दुर्भाग्यवश पत्नी से बिछड़ हुआ मैं तुमसे याचना करता हूं , क्योंकि अधिक गुणों वाले पुरुष से की गई याचना निष्फल होने पर भी कुछ अच्छी है। परंतु निर्गुण पुरुष से की गई ट सफल होने पर भी अच्छी नहीं होती है।

श्लोक नंबर 7
संतप्‍तानां त्‍वमसि शरणं तत्‍पयोद! प्रियाया:
      संदेशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्‍य।
गन्‍तव्‍या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्‍वराणां
      बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्‍चन्द्रिकाधौतह्मर्म्या ।।

अन्वय:- 
हे पयोद! त्वं संतप्‍तानां शरणं अस्ति, तंत्र 
धनपतिक्रोधविश्लेषितस्‍य में संदेशं प्रियाया:
हर। बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्‍चन्द्रिकाधौतह्मर्म्या
अलका नाम यक्षेश्‍वराणां वसति: ते गन्‍तव्‍या

हिंदी अनुवाद:-
हे मेघ! सन्तापयुक्तों के रक्षक हो, इस कारण से कुबेर के कोप से पत्नी से बिछड़े वह मेरे संदेश को प्रिया के समीप ले जाओ। बाहर के उद्यान में विद्यमान शिव जी के सिर में स्थित चांदनी से उज्जवल धनीको के वनों से संपन्न अलका  नाम की पूरी में तुम्हें जाना है।
 
श्लोक नंबर 8
त्वामारूढं पवनपदवीमुद्गृहीतालकान्‍ता:
      प्रेक्षिष्‍यन्‍ते पथिकवनिता: प्रत्‍ययादाश्‍वसन्‍त्‍य:।
क: संनद्धे विरहविधुरां त्‍वय्युपेक्षेत जायां
      न स्‍यादन्‍योsप्‍यहमिव जनो य: परा
धीनवृत्ति:।।
अन्वय:- 
पवनपदवीम् आरूढं तरवां पथिकवनिता: प्रत्‍ययात्
श्‍वसन्‍त्‍य उद्गृहीतालकान्‍ता: प्रेक्षिष्‍यन्‍ते। त्वयि संनध्दे (सन्ति)
अहमद इव तो जन पराधीनवृत्ति: न समयांतर (स:) क : 
आन्यो विरहविधुरां जायां उपेक्षेत।।

हिंदी अनुवाद:-
हे मेघ! आकाश मार्ग से विचरण करने वाले तुमको पथिकों की स्त्रियां पति के आगमन के विश्वास से आश्वस्त हो कर केशों के अग्रभाग को ऊंचा कर देखेगी। तुम्हारे आगमन काल में मेरे समान पराधीन पुरुष को छोड़कर और कौन व्यक्ति योग से दुर्बल अपनी पत्नी की उपेक्षा करेगा?

श्लोक नंबर 9
मन्‍दं मन्‍दं नुदति पवनश्‍चानुकूलो यथा त्‍वां
     वामश्‍चायं नदति मधुरं चातकस्‍ते सगन्‍ध:।
गर्भाधानक्षणपरिचयान्‍नूनमाबद्धमाला:
     सेविष्‍यन्‍ते नयनसुभगं खे भवन्‍तं  बलाका:।।

अन्वय:-
अनुकुल: पवनो मन्दं यथा त्वं मंन्दं नुदति। क्यों सगन्‍ध: ते
वाम: चातको मधुरं नुदति। गर्भाधानक्षणपरिचयात्
खे आबद्धमाला बलाका: नयनसुभगं भवन्‍तं नूनं सेविष्‍यन्‍ते।।

हिंदी अनुवाद:-
अनुकूल वायु मंद गति वाले तुमको धीरे-धीरे प्रेरणा कर रहा है।
तुम्हारे वाम भाग में स्थितियां पपीहा गर्व के साथ मधुर शब्द कर रहा है। गर्भधारण के उत्सव में परिचय होने से आकाश में पड़क्तिबद्ध होकर बगुलियां नेत्रों में सुंदर प्रतीत होने वाले तुम्हारा आश्रय अवश्य कर लेंगी।

श्लोक नंबर 10
तां चावश्‍यं दिवसगणनातत्‍परामेकपत्‍नी-
     मव्‍यापन्‍नामविहतगतिर्द्रक्ष्‍यसि भ्रातृजायाम्।
आशाबन्‍ध: कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां
     सद्य:पाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रुणद्धि।।
अन्वय:-
दिवसगणनातत्‍पराम् अव्‍यापन्‍नाम् एकपत्‍नीं भ्रातृजायाम्
ताम्र अविहतगति: अवश्यं र्द्रक्ष्‍यसि। आशाबन्‍ध: प्रणयि
कुसुमसदृशं विप्रयोगे सद्य:पाति अङ्गनानां हृदयं प्रायशो
रुणद्धि।

हिंदी अनुवाद:-
हे मेघ! विरह के अवशिष्ट दिनों की गणना में व्यग्र और मैं आगमन की आशा से प्राण धारण करने वाली पवित्रता अपनी भौजाई (मेरी पत्नी) को तुम अविच्छिन्न गति से अवश्य देख लोगे, क्योंकि आशा रोग बंधन प्रेम पूर्ण, फूल के समान सुकुमार तथा विरह में तत्क्षण नष्ट होने वाले अबलाओं के जीवन को अक्सर रोक रखता है।

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