Kalidas story in hindi
UPSC) Sanskrit notes
संस्कृत साहित्य के श्रेष्ठ कवि तथा नाट्कायर कालिदास के काव्यगत उत्कर्ष की समीक्षा को छोड़कर उसके विषय में सब कुछ विवादस्पद है। उनका जीवन वृत्त कतिपय दंत कथाओं के रूप में है, स्थान और काल की खींचतान आज भी चल रही है, उसके मूल्य स्थान और कर्म क्षेत्र को लेकर आज भी इतिहासकारों मेंर विवाद है, काम को लेकर शताब्दियों का अन्तराल माना जाता है तथा कालिदास के नाम में संस्कृत में कई रचनाओं का निरूपण किया जाता है। राजशेखर ने श्रृंगार रस की रचना करने वाले कालिदास नाम वाले तीन कवियों का निर्देश दिया है-
एकोऽपि जियाते हंत कालिदासो न केनचित्।
श्रृंग्ड़ारे ललितोद्गगारे कालिदासत्रयी कीमु।।
संप्रति कालिदास के नाम से प्राया ऐसी रचनाओं का निर्देश मिलता है किंतु इसमें मूल्य एवं प्राचीन कालिदास की सात रचनाएं ही प्रमाण सिद्ध है इसमें दो महाकाव्य है कुमारसंभव तथा रघुवंश। इनके अतिरिक्त 3 नाटक है मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय तथा अभिज्ञान शकुंतल। कालिदास ने गीत काव्य (खंडकाव्य) लिखे थे- ऋतुसंहार कथा मेघदूत। अन्य रचनाएं परिवर्तित कवियों के द्वारा लिखी गई है जैसे- श्रृंगार तिलक, श्रुतबोध, राक्षसकाव्य आदि।
जीवन वृत्त- कालिदास के संबंध में अनेक दंत कथाएं प्रचलित हैं। उन्हेंंंं परंपरा से विक्रमादित्य नाम राजाा की सभा केे नवरत्नों मैंं अन्यतम माना हैै किंतु जिन रत्न स्वरूप कवियों विद्वानों की गणना उसके सााथ की गई है। विभिन्न का कालोों के हैं यह स्पष्ट काल वाले हैं। विक्रमादित्य की पहचान भी कठिन है। 'भोज प्रबंध' नामक नितांत काल्पनिक कथाा ग्रंथ मैं धारा नरेश भोज की राज्यसभा में संस्कृत के सभी कवियोंं को दिखाया गया है। जिसमेंंं कालिदास मुख्य थे। एक किंवदन्ती यह भी है कि कालिदास सीहल नरेश कुमार दास (५००ई०) के मित्र थे उसका अंतिम समय लंका में बीता जहां एक वैश्य में धन लोग में उनकी हत्या कर दी। किंवदन्ती के अनुसार कालिदास बाल्यावस्था में अत्यंत मूर्ख थे। पंडितों ने षड्यंत्र करके उस समय की श्रेष्ठ विदुषी किंतु ज्ञानगर्विता विद्योत्तमा का विवाह उसे कर दिया। मौन शास्त्री
मैं कालिदास से विधोतमा की पराजय दिखाई गई किंतु विवाह के अंतराल पत्नी से अपमानित हो कालिदास में काली की उपासना की और पुण: विदुषी पत्नी के पास होकर विद्यामण्डित होकर पहुंचे। पत्नी ने पूछा अस्ति कश्चिद् वाग्विशेष:(अर्थात वाणी में कुछ विशेषता आ गई है क्या)? इस पर कालिदास ने प्रश्न के उत्तर 3 शब्दों से आरंभ करकेे क्रमश: कुमारसंभवम् (अस्त्युत्त्तरस्यं दिशि देवात्मा), मेघदूत (किंचितकान्ता विरहगुरुणा) और रघुवंशम ( वागर्थााविव संपृक्तौ) नामक कवियों की रचना की।
उनके ग्रंथ के अनुसशीलन से परोक्षत: यह ज्ञात होता है कि कालिदास का जन्म से ब्राह्मण तथा शिव भक्त थे। उनमें धार्मिक सहिष्णुताथे क्योंकि शिव के अतिरिक्त विष्णु आदि अन्य देवताओं की वंदना भी उन्होंने की है।शिव के अष्टमूर्ति रूपों की चर्चा कालिदास ने विशेष रूप से की है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव को कालिदास का एक ही परमेश्वर के कार्य भेद से भिन्न रूप मानते हैं। यद्यपि शैव धर्मके किसी विशेष संप्रदाय से कालिदास को जोड़ने में डॉक्टर मिराशी कठिनाई मानते हैं किंतु डॉक्टर भगवत शरण उपाध्याय में शिव के नामों में 'पशुपति'(कुमार.६/९५ तथा मेघदूत १/३६), 'भूतनाथ' (रघुवंशम २/५८) एवं 'भूतेश्वर' (रघुवंश २/४६) का प्रयोग देखकर, उन्होंने पशुपत संप्रदाय से संबंध मानते हैं। किंतु या कोई दृढ़ आधार नहीं है वस्तुत: धर्म के विषय में कालिदास की दृष्टि उदार थी। ब्राह्मण धर्म के उदारता पक्षों में उनकी आस्था थी।
रघुवंश (सर्ग ६ तथा १३) एवं मेघदूत (पूर्व भाग) मैं भारत के भौगोलिक वर्णन से अनुमान होता है की कालिदास ने भारत की विस्तृत यात्रा की थी। उनके भौगोलिक वर्णन यथार्थ और स्वाभाविक है। हिमालय और उज्जैनी के प्रति उनका विशेष आकर्षण था किंतु कोई संकीर्ण क्षेत्रीय भावना उनमें नहीं मिलती। कालिदास का भौतिक जीवन सुखमय था। उनके ग्रंथों में जीवन के कष्ट, निर्धनता आदि के वर्णनों का अभाव रहने से अनुमान होता है कि उन्हें अर्थ कष्ट नहीं था। उन्हें राजपूतों से परिचय तथा संबंध था।उन्होंने विभिन्न शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया था जैसे वेद दर्शन उपनिषद रामायण महाभारत पुराण चिकित्सा शास्त्र संगीत ज्योतिष व्याकरण छंद आदि। जीवन के आनंद में देना कालिदास का जीवन दर्शन। इस सौंदर्य का वर्णन अपने पर भी वे कामुक जीवन कोशिश कर नहीं मानते।आध्यात्मिक और तपोमुलक प्रेम ही उनकी दृष्टि में आदर्श प्रेम है। शारीरिक सौंदर्य पर आश्रित प्रेम वास्तविक नहीं।
कालिदास के निवास स्थान के रूप में काशी (विधोतमा के स्वयंवर की दंतकथा के आधार पर), बंगाल (दास उपाधि के कारण), विदर्भ (पीटर्सन का मत), विदिशा (राजधानी करने तथा समीपवर्ती छह स्थानों का वर्णन देने से), अयोध्या (रघुवंश में इसके प्रति आकर्षण देखने से), मिथिला (उज्चैठ ग्राम में दुर्गा के मंदिर के कारण), कश्मीर (प्रोफेसर लक्ष्मीधर कल्ला काम ), गढ़वाल (मंदाकिनी के तट पर) उज्जैनी का विवेचन किया गया है।आधुनिक विद्वानों ने अपनी रुचि, मेघा और युक्तियों के आधार पर उपयोग क्षेत्रों में किसी एक को कालिदास का जन्म स्थान का यह कर्म क्षेत्र माना है। इसमें सर्वाधिक युक्तियां और मान्यता उज्जैनी के पक्ष में है। प्रोफेसर मिराशी ,झाला तथा अरविंद का कथन है कि कालिदास ने यद्यपि अपने नगरों और प्रदेशों का वर्णन किया है तथापि उज्जैनी के प्रति उसका अद्भुत आकर्षण है।
मेकरम माल रामगिरि से अलकापुरी तक दिखाते हुए वे उसे 'वक्र: पंथा:' (पेड़ा रास्ता) होने पर भी उज्जैनी भेजते हैं तथा वहां का लंबा चौड़ा वर्णन करते हैं। कुल 11 श्लोकों में उज्जयिनी की अपार संपत्ति, शिप्रा नदी के तट की वायु, प्राचीन कथाएं, महाकाल मंदिर, संध्या की आरती में वैश्य के नृत्य, रात्रि में प्रियतमों से मिलने के लिए जाने वाली अभीसारीकाएं इत्यादि के वर्णन कवि ने किए हैं । ऐसा हृदयावर्जक वर्णन उन्होंने केवल अलकापुरी का ही किया है। स्मारणीय है कि अलका दिव्य नगरी है इसके वर्णन में कभी यथार्थ को छोड़कर कल्पना लोग में प्रविष्ट हो गए हैं। किंतु उज्जैनी के वर्णन में वास्तविकता है, कवि के अपने अनुभव है। अधिसंख्यक विद्वान इसी मत के समर्थक हैं कवि का जन्म स्थान जहां भी हो अपने जीवन का एक मुख्य अंश उन्होंने महाकाल की सेवा में उज्जैनी में रहकर बिताया था। उनका अनुभव व्यापक था भारत के विभिन्न प्रदेशों की यात्रा उन्होंने अवश्य की थी।
एकोऽपि जियाते हंत कालिदासो न केनचित्।
श्रृंग्ड़ारे ललितोद्गगारे कालिदासत्रयी कीमु।।
संप्रति कालिदास के नाम से प्राया ऐसी रचनाओं का निर्देश मिलता है किंतु इसमें मूल्य एवं प्राचीन कालिदास की सात रचनाएं ही प्रमाण सिद्ध है इसमें दो महाकाव्य है कुमारसंभव तथा रघुवंश। इनके अतिरिक्त 3 नाटक है मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय तथा अभिज्ञान शकुंतल। कालिदास ने गीत काव्य (खंडकाव्य) लिखे थे- ऋतुसंहार कथा मेघदूत। अन्य रचनाएं परिवर्तित कवियों के द्वारा लिखी गई है जैसे- श्रृंगार तिलक, श्रुतबोध, राक्षसकाव्य आदि।
जीवन वृत्त- कालिदास के संबंध में अनेक दंत कथाएं प्रचलित हैं। उन्हेंंंं परंपरा से विक्रमादित्य नाम राजाा की सभा केे नवरत्नों मैंं अन्यतम माना हैै किंतु जिन रत्न स्वरूप कवियों विद्वानों की गणना उसके सााथ की गई है। विभिन्न का कालोों के हैं यह स्पष्ट काल वाले हैं। विक्रमादित्य की पहचान भी कठिन है। 'भोज प्रबंध' नामक नितांत काल्पनिक कथाा ग्रंथ मैं धारा नरेश भोज की राज्यसभा में संस्कृत के सभी कवियोंं को दिखाया गया है। जिसमेंंं कालिदास मुख्य थे। एक किंवदन्ती यह भी है कि कालिदास सीहल नरेश कुमार दास (५००ई०) के मित्र थे उसका अंतिम समय लंका में बीता जहां एक वैश्य में धन लोग में उनकी हत्या कर दी। किंवदन्ती के अनुसार कालिदास बाल्यावस्था में अत्यंत मूर्ख थे। पंडितों ने षड्यंत्र करके उस समय की श्रेष्ठ विदुषी किंतु ज्ञानगर्विता विद्योत्तमा का विवाह उसे कर दिया। मौन शास्त्री
मैं कालिदास से विधोतमा की पराजय दिखाई गई किंतु विवाह के अंतराल पत्नी से अपमानित हो कालिदास में काली की उपासना की और पुण: विदुषी पत्नी के पास होकर विद्यामण्डित होकर पहुंचे। पत्नी ने पूछा अस्ति कश्चिद् वाग्विशेष:(अर्थात वाणी में कुछ विशेषता आ गई है क्या)? इस पर कालिदास ने प्रश्न के उत्तर 3 शब्दों से आरंभ करकेे क्रमश: कुमारसंभवम् (अस्त्युत्त्तरस्यं दिशि देवात्मा), मेघदूत (किंचितकान्ता विरहगुरुणा) और रघुवंशम ( वागर्थााविव संपृक्तौ) नामक कवियों की रचना की।
उनके ग्रंथ के अनुसशीलन से परोक्षत: यह ज्ञात होता है कि कालिदास का जन्म से ब्राह्मण तथा शिव भक्त थे। उनमें धार्मिक सहिष्णुताथे क्योंकि शिव के अतिरिक्त विष्णु आदि अन्य देवताओं की वंदना भी उन्होंने की है।शिव के अष्टमूर्ति रूपों की चर्चा कालिदास ने विशेष रूप से की है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव को कालिदास का एक ही परमेश्वर के कार्य भेद से भिन्न रूप मानते हैं। यद्यपि शैव धर्मके किसी विशेष संप्रदाय से कालिदास को जोड़ने में डॉक्टर मिराशी कठिनाई मानते हैं किंतु डॉक्टर भगवत शरण उपाध्याय में शिव के नामों में 'पशुपति'(कुमार.६/९५ तथा मेघदूत १/३६), 'भूतनाथ' (रघुवंशम २/५८) एवं 'भूतेश्वर' (रघुवंश २/४६) का प्रयोग देखकर, उन्होंने पशुपत संप्रदाय से संबंध मानते हैं। किंतु या कोई दृढ़ आधार नहीं है वस्तुत: धर्म के विषय में कालिदास की दृष्टि उदार थी। ब्राह्मण धर्म के उदारता पक्षों में उनकी आस्था थी।
रघुवंश (सर्ग ६ तथा १३) एवं मेघदूत (पूर्व भाग) मैं भारत के भौगोलिक वर्णन से अनुमान होता है की कालिदास ने भारत की विस्तृत यात्रा की थी। उनके भौगोलिक वर्णन यथार्थ और स्वाभाविक है। हिमालय और उज्जैनी के प्रति उनका विशेष आकर्षण था किंतु कोई संकीर्ण क्षेत्रीय भावना उनमें नहीं मिलती। कालिदास का भौतिक जीवन सुखमय था। उनके ग्रंथों में जीवन के कष्ट, निर्धनता आदि के वर्णनों का अभाव रहने से अनुमान होता है कि उन्हें अर्थ कष्ट नहीं था। उन्हें राजपूतों से परिचय तथा संबंध था।उन्होंने विभिन्न शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया था जैसे वेद दर्शन उपनिषद रामायण महाभारत पुराण चिकित्सा शास्त्र संगीत ज्योतिष व्याकरण छंद आदि। जीवन के आनंद में देना कालिदास का जीवन दर्शन। इस सौंदर्य का वर्णन अपने पर भी वे कामुक जीवन कोशिश कर नहीं मानते।आध्यात्मिक और तपोमुलक प्रेम ही उनकी दृष्टि में आदर्श प्रेम है। शारीरिक सौंदर्य पर आश्रित प्रेम वास्तविक नहीं।
कालिदास के निवास स्थान के रूप में काशी (विधोतमा के स्वयंवर की दंतकथा के आधार पर), बंगाल (दास उपाधि के कारण), विदर्भ (पीटर्सन का मत), विदिशा (राजधानी करने तथा समीपवर्ती छह स्थानों का वर्णन देने से), अयोध्या (रघुवंश में इसके प्रति आकर्षण देखने से), मिथिला (उज्चैठ ग्राम में दुर्गा के मंदिर के कारण), कश्मीर (प्रोफेसर लक्ष्मीधर कल्ला काम ), गढ़वाल (मंदाकिनी के तट पर) उज्जैनी का विवेचन किया गया है।आधुनिक विद्वानों ने अपनी रुचि, मेघा और युक्तियों के आधार पर उपयोग क्षेत्रों में किसी एक को कालिदास का जन्म स्थान का यह कर्म क्षेत्र माना है। इसमें सर्वाधिक युक्तियां और मान्यता उज्जैनी के पक्ष में है। प्रोफेसर मिराशी ,झाला तथा अरविंद का कथन है कि कालिदास ने यद्यपि अपने नगरों और प्रदेशों का वर्णन किया है तथापि उज्जैनी के प्रति उसका अद्भुत आकर्षण है।
मेकरम माल रामगिरि से अलकापुरी तक दिखाते हुए वे उसे 'वक्र: पंथा:' (पेड़ा रास्ता) होने पर भी उज्जैनी भेजते हैं तथा वहां का लंबा चौड़ा वर्णन करते हैं। कुल 11 श्लोकों में उज्जयिनी की अपार संपत्ति, शिप्रा नदी के तट की वायु, प्राचीन कथाएं, महाकाल मंदिर, संध्या की आरती में वैश्य के नृत्य, रात्रि में प्रियतमों से मिलने के लिए जाने वाली अभीसारीकाएं इत्यादि के वर्णन कवि ने किए हैं । ऐसा हृदयावर्जक वर्णन उन्होंने केवल अलकापुरी का ही किया है। स्मारणीय है कि अलका दिव्य नगरी है इसके वर्णन में कभी यथार्थ को छोड़कर कल्पना लोग में प्रविष्ट हो गए हैं। किंतु उज्जैनी के वर्णन में वास्तविकता है, कवि के अपने अनुभव है। अधिसंख्यक विद्वान इसी मत के समर्थक हैं कवि का जन्म स्थान जहां भी हो अपने जीवन का एक मुख्य अंश उन्होंने महाकाल की सेवा में उज्जैनी में रहकर बिताया था। उनका अनुभव व्यापक था भारत के विभिन्न प्रदेशों की यात्रा उन्होंने अवश्य की थी।

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