मीमांसा दर्शन
(Sanskrit upsc topic)
मीदर्शन के सूत्र कार है महर्षि जैमिनी। इन्होंने 16 अध्याय में इस दर्शन के मूलभूत सिद्धांतों की रचना की, जिसमें से आरंभ के 12 अध्याय 'द्वादशलक्षणी' के नाम से और अंतिम 4-'संकर्षण कांड'या 'देवता कांड'के नाम से प्रसिद्ध है। यह सूत्र ढाई हजार से ऊपर है (२६४४) और अधिकारणों की संख्या 900 से थोड़ी अधिक है। इन चित्रों में धर्म तथा उससे संबंधित विषय का बड़ा है विस्तृत तथा व्यापक वितरण प्रस्तुत किया गया है। इस दर्शन के भाष्कायर है शबरस्वामी, जिन्होंने पूरे सूत्र के ऊपर बड़ा तथा प्रमाणित भाग से लिखा है। इस भाष्य पर जिन तीन आचार्यों ने अपने स्वार्थ तथा व्याख्यान प्रस्तुत की है-
(क) कुमारिल भट्ट (सप्तम शती विक्रमी)-इस योग के बड़े ही प्रौढ़ व्याख्या कार मीमांसक है, जिसके ग्रंथ मीमांसा-शास्त्र के विश्व कोश माने जाते हैं। यह ग्रंथ है- 'श्लोकवर्तिक' 'तंत्रवर्तिक' तथा 'टुपटीका- अंतिम 9 अध्यायो की संक्षिप्त विवृति। कुमारिल का मीमांसा के विषय में अपना एक विशिष्ट मत है, इसके अनुयायी मंडन मिश्र (सप्तम शताब्दी), पार्थ सारथी मिश्र (12 वीं शताब्दी) माधवाचार्य (१४वीशताब्दी) तथा खंडदेव (७ वी शताब्दी) जैसे मीमांसक मुर्धन्य है ।यह मत या भााट्ट संप्रदाय के नाम से विद्वानों में विख्यात है।
मीमांसा को या अभीष्ट नहीं। वह इधर उधर नाचने वाले कणो को ही परमाणु मानता है, परंतु मीमांसा उन्हें समान प्रत्यक्ष का विषय मानती है। उसकी दृष्टि में साधारण प्रत्यक्ष से योग आज प्रत्यक्ष को विलक्षण अनुभूति नहीं होती। अत: वह उसकी सत्यता में विश्वास नहीं करता। 'मानमेयोदय' मैं नारायण भट्ट ने स्पष्ट लिखा है- जालरंध्रविसरद् रवितेजो जालभासूरपदार्थविशेषान्। अल्पकानिह पुन: परमाणून् कल्पयन्ति हि कुमारिल शिष्या:।। तत्वों के विषय में मीमांसा के संप्रदायों में पार्थिक्य लक्षित होता है-
(क)कुमारिल मत में पांच पदार्थ- द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य तथा अभाव।
(ख) गुरु मत में 8 पदार्थ- द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, परतंत्रता, शक्ति, सादृश्य और संख्या।
(ग) मुरारि मत के पांच पदार्थ- ब्राह्मण तथा अलौकिक पदार्थ
4-धार
१. धर्मि विशेष, २. धर्म विशेष, ३. आधार विशेष तथा ४. प्रदेश विशेष।
(ख) प्रभाकर भट्ट- अपनी विद्वता के कारण यह 'गुरु' के उपनाम से मंडित है। इसका भी एक स्वतंत्र संप्रदाय है, जो मीमांसा के तथ्यों के विषय में कुमारील की अपेक्षा भीन्न मत रखता है। इसका मतलब 'गुरु मत' के नाम से प्रख्यात है। इस्मत के आचार्यों में शालिक नाथ, प्रभाकर के पट शिष्य तथा मुख्य व्याख्याता माने जाते हैं। इन्होंने 'प्रकरण पंचिका' जैसे उदात्त प्रोढ़ ग्रंथ का प्रणयन कर गुरु के सिद्धांतों को अपनी शेमुपी से नितांत उद्भासित किया है ।
(ग) मुरारि मिश्र-इसके विषय में हमारा ज्ञान बहुत ही कम है।
इन्हीं आचार्य के ग्रंथों में मीमांसा का दर्शन अपने पूर्व वैभव के साथ परिष्कृत रूप में अपने अभिव्यक्त आ पा रहा है।
ज्ञान मीमांसा
प्रमाणों के विषय में भट्ट तथा गुरु मत में अंतर हैं। भाट्टो के मत में ६ प्रमाण होते हैं -
१. प्रत्यक्ष
२. अनुमान
३. उपमान
४. शब्द
५. अर्थापत्ति
६. अनुउपलब्धि
१. प्रत्यक्ष- मीमांसा न्याय के समान ही यथार्थवादी तत्वज्ञान है।प्रत्याक्ष तथा अनुमान की कल्पना न्याय के समान ही यहां स्वीकृत की गई है। इन्हें प्रत्यक्ष के दोनों भेद- र्निर्विकल्प तथा सविकल्पक- मान्य है। र्निर्विकल्प प्रत्यक्ष को ये लोग 'आलोचन ज्ञान' के नाम से अभिहित करते हैं। या ज्ञातव्य है कि र्निर्विकल्पक को वैयाकरण नहीं मानते हैं और सविकल्प को बौध्द। छ : प्रकार के सन्निकर्षौ में भाटृ लोग दो ही सन्निकर्ष मानते हैं- सहयोग और संयुक्त तादात्म्य।
२. अनुमान- अनुमान की प्रक्रिया न्याय तथा मीमांसा में क्षधिकांश में समानता रखती है।
३. उपमान- मीमांसा के मत में उपमान एक स्वतंत्र प्रमाण है। मीमांसा के अनुसार उपमानजन्य ज्ञान तब होता है जब किसी पहले देखी गई वस्तु के सदृश्य कोई पदार्थ देखने पर स्मृत पदार्थ के सादृश्य का ज्ञान होता है। दिखाई पड़ने वाली वस्तु के सादृश्य के स्मरण की गई वस्तु के साथ दृश्य का ज्ञान "उपमिति" कहलाती है। उदाहरण के लिए- गाय को देखने वाला व्यक्ति जंगल में जाता है और उसी के समान नीलगाय को देखता है। तब सादृश्य के कारण उसे गाय की स्मृति होती है और उसे या ज्ञान होता है कि 'गाय नीलगाय के समान है' यही ज्ञानमती कहलाता है।
यह ज्ञान एक स्वतंत्र ज्ञान है जिसका अंतर अन्य प्रमाणों से स्पष्टतया प्रतीत होता है। या ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान से भिन्न है क्योंकि सादृश्य को धारण करने वाली वस्तु (गाय) उस समय दृष्टिगोचर नहीं होता,जिस समय हमें गाय का ज्ञान पहले हुआ उस समय नीलगाय के साथ उसका सदृश्य कदापि ज्ञात नहीं था। फलत: अन्य वस्तु के साथ सदृश्य का अनुभव ना होने से यह 'स्मृति' भी नहीं कहा जा सकता। व्याप्ति के दूषित होने के कारण नाया अनुमान के अंतर्गत आ सकता है और ना शब्द के।इसलिए उपमान का परमाणु से अलग एक स्वतंत्र प्रमाण माना जाता है।
४. शब्द- वाक्य के अर्थ का ज्ञान होना 'शब्द प्रमाण' कहलाता है। मीमांसा के मत में शब्द 'नित्य' है और वेद शब्द की राशि होने से 'नित्य' है। या किसी के द्वारा प्राणित नहीं होता। फलत: या फिर उसके प्रत्यय से बहिर्भूत होने के कारण 'अपौरुषैय' कहलाता है। इसके विपरीत न्याय दर्शन वेद को पुरुष अर्थात ईश्वर द्वारा विरचित मानकर उसे 'पोरुषेय' मानता है। इस विषय को लेकर न्याय तथा में मानसा में गहरा मतभेद है। जैमिनी, श्र तथा कुमारिल मैं बड़ी प्रौढ़ युक्तियां देखकर वेद के 'अपौरुषेयत्व' को सिद्ध किया है।
५. अर्थापत्ति- दृष्ट अर्थ की व्याख्या के लिए किसी अदृष्ट अर्थ की कल्पना करना, जिसके बिना उस वस्तु की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती, अर्थापत्ति कहलाती है। अर्थापत्ति का स्वतंत्र प्रमाण है, क्योंकि इसके द्वारा उपलब्ध ज्ञान को ना हम प्रत्यक्ष से, ना शब्द से और ना अनुमान से जान सकते हैं । मोटे होने वाले व्यक्ति को रात में भोजन करते हमने नहीं देखा, तब उसे प्रत्यक्ष हम नहीं कर सकते। उसके रात के समय भोजन करने की बात किसी आप्त पुरुष के वचनों के द्वारा हमें ज्ञात नहीं हुई। अतः शब्द भी यहां ठीक नहीं। अनुमान के लिए ठीक व्याप्ति ही नहीं जलती। इसलिए इससे उत्पन्न ज्ञान इन तीनों प्रमाणों के भीतर अंत भूत नहीं हो सकता। आता मीमांसाकों मैं अर्थापत्ति को स्वतंत्र अमान माना है।
दैनिक जीवन में इसकी उपयोगिता बहुत ही अधिक है।वाक्य के अर्थ समझने के लिए अर्थापत्ति सहायता करती है जैसे किसी ने कहा 'काशी नगरी गंगा जी' पर है, इस वाक्य का अर्थ ठीक नहीं जनता, इसलिए अर्थापत्ति के द्वारा हमें यह ज्ञात होता है कि 'काशी नगरी गंगा के तट पर है'। यहां 'गंगा पर' का अर्थ होता है 'गंगा के तट पर' और यह अर्थापत्ति के द्वारा होता है।प्रतिदिन के जीवन में अर्थापत्ति हमारे विशेष सहायता करती है। हम अपने मित्र से मिलने को शाम को उसके घर जाते हैं। सवेरे उससे भेट हो चुकी है। वे भले चंगे हैं। इसका ज्ञान हमें पहले से है, परंतु वे घर पर उस समय नहीं मिलते। फलत: हम अर्थापत्ति के द्वारा जानते हैं कि वह कहीं बाहर गए होंगे। पता जीवित व्यक्ति का घर पर ना मिला तभी उत्पन्न होता है जब उसके बाहर जाने की घटना की कल्पना की जाए। इस प्रकार इस का बहुत उपयोग हमारे लिए है।
६. अनुपलब्धि- 'अनुपलब्धि' का अर्थ है किसी पदार्थ की उपलब्धि का प्राप्त ना होना। अभाव की सिद्धि में यही प्रमाण है। इस समय मेरे हाथ में लेखनी नहीं है। यदि होती, तो अवश्य उपलब्ध होती। अतः वस्तु की अनुपलब्धि उसके अभाव की को सूचित करती है। इस प्रकार प्रमाण को स्वतंत्र रूप से मानने के लिए भाट्ट मीमांसाको का बड़ा आग्रह है। वह इस समस्त ज्ञात प्रमाणों से भिन्न मानते हैं। अनुपलब्धि प्रत्यक्ष प्रमाण से भिन्न है, क्योंकि हम नेत्रों से घट को देख सकते हैं, घटा भाव को तो नहीं।घाट के अभाव से हमें नेत्र इंद्रिय का कभी संयोग नहीं होता। इसलिए यह प्रत्यक्ष नहीं, प्रयुक्त अनुपलब्धि के द्वारा ही अभाव का ज्ञान हमें होता है। यह अनुमान भी नहीं है। अनुमान के लिए जिस उचित व्याप्ति को सत्ता होनी चाहिए, वाह यहां नहीं है। इसलिए अनुपलब्धि को अनुमान से भी मानना पड़ता है। आप्तवाक्य के ना होने से यह शब्द भी नहीं है और सा दृश्य ज्ञान ना होने से उपमान भी नहीं है। फलत: यह है एक स्वतंत्र प्रमाण कुमारिल भट्ट के अनुयायी तथा अव्दैनी वेदांती ने इसे प्रमाण मानते हैं, परंतु प्रभाकर इसे नहीं मानते। उसका मत है कि अब हाऊ जिस स्थान में रहता है तद्रूप ही होता है। घाट का भाव जिस स्थान पर,जिस अधिकार में रहेगा वह अधिकार रूप ही होता है। अतः प्रभाकर की दृष्टि से अभाव की सिद्धि के लिए एक नवीन प्रमाण मारने की आवश्यकता तनिक भी नहीं है।
तत्व मीमांसा
बाहरी वस्तुओं की उपलब्धि के साधन तो हमारी इंद्रियां ही है। इसके द्वारा जगत केे पदार्थों की उपलब्धि जिस रूप में होतीी है, उसीी रूप में जगत की सत्यता है। 'श्लोकवर्तिक'मैं कुमारिल भट्ट का कथन है-
तस्माद यद् गृह्यते वस्तु येन रूपेण सर्वदा।
तत् तथैवाभ्युपेतव्यं समान्यमथवेतरत्।।
मीमांसा का एक देश अनुवाद को मानता है। न्याय वैशेषिक अनुवाद को स्वीकार करता है, परंतु दोनों के मत में अंतर है। न्याय परमाणु को प्रत्यक्ष नहीं मानता; परंतु उसे अनुमेय मानता है। पाठकों ने देखा होगा कि जब हमारे कमरे में छत के किसी छेद से सूर्य के किरण आते हैं, तब उसमें अनेक छोटे-छोटे कर नाचते हुए प्रतीत होते हैं। ये बसरेनू हैं और इन्हें का छठा भाग परमाणु कहलाता है; ऐसे न्याय की मान्यता है इस का घोतक यह प्रतीक श्लोक है-
जालान्तरगते भानौ यत् सूक्ष्म दृश्यते रज:।
तस्य पष्ठतमो भाग: परमाणुरिति स्मृृृत:।।
तस्माद यद् गृह्यते वस्तु येन रूपेण सर्वदा।
तत् तथैवाभ्युपेतव्यं समान्यमथवेतरत्।।
मीमांसा का एक देश अनुवाद को मानता है। न्याय वैशेषिक अनुवाद को स्वीकार करता है, परंतु दोनों के मत में अंतर है। न्याय परमाणु को प्रत्यक्ष नहीं मानता; परंतु उसे अनुमेय मानता है। पाठकों ने देखा होगा कि जब हमारे कमरे में छत के किसी छेद से सूर्य के किरण आते हैं, तब उसमें अनेक छोटे-छोटे कर नाचते हुए प्रतीत होते हैं। ये बसरेनू हैं और इन्हें का छठा भाग परमाणु कहलाता है; ऐसे न्याय की मान्यता है इस का घोतक यह प्रतीक श्लोक है-
जालान्तरगते भानौ यत् सूक्ष्म दृश्यते रज:।
तस्य पष्ठतमो भाग: परमाणुरिति स्मृृृत:।।
(क)कुमारिल मत में पांच पदार्थ- द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य तथा अभाव।
(ख) गुरु मत में 8 पदार्थ- द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, परतंत्रता, शक्ति, सादृश्य और संख्या।
(ग) मुरारि मत के पांच पदार्थ- ब्राह्मण तथा अलौकिक पदार्थ
4-धार
१. धर्मि विशेष, २. धर्म विशेष, ३. आधार विशेष तथा ४. प्रदेश विशेष।
इनमें द्रव्य, गुण, कर्म सामान्य का रूपरा या वैसे ही है जैसे न्याय-वैशेषिक के ग्रंथों में प्रतिपादित किया गया है। 'परतंत्रता' वैशेषिक का समवाय पदार्थ है। जो नित्य और अनित्य दोनों प्रकार का है। नित्य पदार्थ में रहने वाली परतन्त्रता नित्य है अनित्य पदार्थों वाली अनित्य। प्रभाकर 'शक्ति' एक स्वतंत्र पदार्थ है। परंतु न्याय इस मत से सहमत नहीं है। इसकी सम्मती में शक्ति प्रतिबंधक का भाव है। शक्ति का अर्थ है प्रतिबंधक या रोकने वाला कारण का ना होना। जैसे अग्नि में दही का सकती है, पर इसका अर्थ क्या है इसका अर्थ है जलने से अग्नि को रोकने वाली जो चीज है वह यहां उपस्थित नहीं है। इसलिए आग जलती है न्याय की भाषा में पति बंधन की भावना विशिष्ट अग्नि ही जलता है अन्य अग्नि ही नहीं। फलत: शक्ति एक नूतन स्वतंत्र पदार्थ नहीं है। सादरी से तथा संख्या गुण के अंतर्गत है।
रवि के भीतर कुमारिल 'अंधकार' को भी एक प्रकार का द्रव्य ही मानते हैं। जिसका विशेषिकों मैं बड़ा आग्रह के साथ खंडन किया है। इनका कहना है कि द्रव्य नाव ही है। तुम तो प्रकाश का अभाव मात्र ठहरा। उससे स्वतंत्र द्रव्यमान ना बड़ी भूल है। इसी संघर्ष और वेदांती श्री हरि ने 'नैषधीयचरितम्' के इस प्रख्यात पद में संकेत किया है-
ध्वान्तस्य वामोरु विचारणायां
वैशैषिकं चारु मतं मतं में।
औलूकमाहु: आलु दर्शनं तत
क्षमं तमस्तत्वनिरूपणाय।।
'मुरारेस्तृतीय: पंथा:' के अनुसार मुरारि की पदार्थ कल्पना दोनों से विलक्षषण है। इस की दृष्टि में ब्रह्म ही एक परमार्थभूत पदार्थ है। परंतुुुु लौकिक व्यवहार की उत्पत्ति के लिए उसे भिन्न चार पदार्थ को स्वीकार करना पड़ता है।-
१. धर्मी विशेष
२. धर्म विशेष
३. आधार विशेष
४. प्रदेश विशेष
रवि के भीतर कुमारिल 'अंधकार' को भी एक प्रकार का द्रव्य ही मानते हैं। जिसका विशेषिकों मैं बड़ा आग्रह के साथ खंडन किया है। इनका कहना है कि द्रव्य नाव ही है। तुम तो प्रकाश का अभाव मात्र ठहरा। उससे स्वतंत्र द्रव्यमान ना बड़ी भूल है। इसी संघर्ष और वेदांती श्री हरि ने 'नैषधीयचरितम्' के इस प्रख्यात पद में संकेत किया है-
ध्वान्तस्य वामोरु विचारणायां
वैशैषिकं चारु मतं मतं में।
औलूकमाहु: आलु दर्शनं तत
क्षमं तमस्तत्वनिरूपणाय।।
'मुरारेस्तृतीय: पंथा:' के अनुसार मुरारि की पदार्थ कल्पना दोनों से विलक्षषण है। इस की दृष्टि में ब्रह्म ही एक परमार्थभूत पदार्थ है। परंतुुुु लौकिक व्यवहार की उत्पत्ति के लिए उसे भिन्न चार पदार्थ को स्वीकार करना पड़ता है।-
१. धर्मी विशेष
२. धर्म विशेष
३. आधार विशेष
४. प्रदेश विशेष

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