दर्शन का उपयोग
(Sanskrit upsc topic)
दर्शन का उपयोग सांख्य की शिक्षा के उपयोग जीवन में किया जा सकता है। क्योंकि समस्त भारतीय दर्शन के उदय का मूल्य कारण सांख्य की है। संसार में दुख की सत्ता का अपलाप लिखकर नहीं किया जा सकता है। दुख की सत्ता इतनी प्रबल है कि मनुष्य को पद पद पर उसे विचलित होना पड़ता है दुख दूर करने के लिए कितना भी उपाय करें दूर नहीं किया जा सकता है। एक प्रकार का दुख होता तो उसे हटाने का मार्ग भी सुगमता से मिल जाता, परंतु यहां तो 3 प्रकार के दुखों का अखंड तथाा अच्छेेेेद्द्य सम्राज्य विराजमान है, जो इस प्रकार है-
वैदिक उपाय- दर्शन हमें बताता है कि "ऋते ज्ञञानान्न मुक्ति:" अर्थात बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं होती। दुखों का मूल्य कारण तो अज्ञान है, जिसका नाश ज्ञान के द्वारा है संभव है। ज्ञान है अंधकार के समान सब तथ्यों का आवरक, ढकने वाला, और ज्ञान है आलोक के सदृश्य सब तत्व का प्रकाशक। बिना चंद्रोदय का अंधकार दूर नहीं होता। इसी प्रकार ज्ञान चंद्र रश्मि माय बिखर कर मानस अंधकार के गाढ़ पटेेल को दूूर करने मैं सामर्थ होती है। इसलिए शास्त्रों, वेदों, पुराणों में ज्ञाान की अपनी महिमा गाई गई है। भारत में दर्शन काा महत्व है, तत्व ज्ञान का उपयोग है; जीवन को लक्ष्य तक पहुंचाने में ज्ञान की भूयसी विशेषताा है। सादर को अपना मार्ग समुन्नत और प्रशस्त बनानेे में दर्शन लाभ पहुंचाता है। परंतु यह बात ध्यान देने की है कि या ज्ञान कोरस ज्ञान नहीं होना चाहिए, प्रयुक्त उसे अपनेेे जीवन में भी उतारना बहुत जरूरी है। जीवन अनुभूति केे सहारे आगे बढ़कर लक्ष्य तक पहुंचता है। यदि ज्ञान ज्ञान अनुभूति का रूप धारण कर जीवन के विषय मार्ग को सरल शोभन, रुचिर-मंदर नहीं बनाता, तो वह वास्तविक नाम हमें नहीं दे सकता। सांख्य दर्शन मैं संक्षिप्त में दर्शन की उपयोगिता का बहुत ही सुंदर कहां हैै
-"दु:खत्रयाभिघातात जिज्ञासा तदपघातके हेतौ
दृृृृृष्टे साऽपार्था चेत् नैकांतात्य यश्रन्तोऽभावात्।
इस महत्वपूर्ण कार्य का का आशय है कि तीनों (अध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) दु:खो के अभीघात से मनुष्य को उन दुखोंं के दूर करने वाले कारणों के जानने की इच्छा होती है। इस दुःखों को दूर करने के लिए तथा निश्चित रूप सेे नष्ट करने के लिए दर्शन शास्त्र की आवश्यकता पड़ती है।
हमारे अपूर्ण जीवन को पूर्णत्व की कोटि में पहुंचा देना दर्शन का वास्तविक उद्देश्य है।भारतीय दर्शन की समस्याओं को अध्यात्म से संबंध समस्याओं को भलीभांति समझा जा सकता है। प्रत्येक साधक अपने जीवन को पूर्ण बनाने का इच्छुक होता है।
हृदय में पूर्णत्व की आकांक्षा का उदय तभी होता है जब मनुष्य को अपने अपूर्णता का ज्ञान होता है, और उसने ज्ञानो उद्दीपन की इच्छा प्रकट होती है तब तक वह अपने को अपूर्ण नहीं जानता, तब तक पूर्ण हो जाने की इच्छा का उदय ही नहीं होता। इसलिए श्रीमद भगवत गीता में ज्ञान के साधनों के बीच 'जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम्' को ज्ञान ही मानता है अर्थात जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग दुखदायी होता है और उसमें दोस्त भरा हुआ है, इस बात का बारंबार विचार करना भी ज्ञान रूप ही है। जब तक इसमें दुख का ज्ञान नहीं होता, तब तक यथार्थ सुख पाने की इच्छा का उदय नहीं होता।
भूतों की इच्छा तथा पूर्णत्व तत्व की आकांक्षा में महान अंतर है। इसका सांसारिक वस्तुओं, स्वार्थ निष्ठ अधिकार, अपना प्रभुत्व तथा इंद्र जय भोग विलास की चाह है।
यदि मनुष्य अपने वास्तविक उन्नति चाहता है तो उसके ह्रदय में पूर्णत्व की आकांक्षा की दीपशिखा जल्दी ही चाहिए। पंखों से रहित पक्षी उड़ नहीं सकते, उसी प्रकार पूर्णत्व की आकांक्षा के बिना मनुष्य ना तो अपने को कुछ बना सकता है, ना विषय वासनाओं का विजय प्राप्त कर सकता है। वह सम्मानित रानी के समान अपनी इंद्रियों का दास तथा विषयों के अधीन बना रहता है और निर्बल होने के कारण हुआ घटनाओं की परिवर्तन धारा में इधर-उधर भटकता रहता है।
पूर्णत्व की आकांक्षा से संपन्न मानव की स्पष्ट पहचान है।अपनी सोच दशा से असंतोष तथा उच्च बनने की चाह जिस प्रकार प्रबुद्ध ही मानो आगे बढ़ना चाहता है, निंद्रा से जाग कर अपने को ज्ञान के मार्ग पर बढ़ते हुए पाता है उसी प्रकार इस आकांक्षा वाला मनुष्य भी अपनी वर्तमान हिंन दीन दशा की बुराई से परिचित हो जाता है। और चाहता है कि वह श्रेष्ठतम स्थिति को पार करें। इस प्रकार की आकांक्षा करने से मनुष्य को कल्पनातीत विलक्षण पर प्राप्त होता है। कठिन से कठिन वस्तु उसके लिए सुलभ बन जाती है। वास्तविक उन्नति का मार्ग खुल जाता है उसके ह्रदय में दिव्य ज्ञान का तथा प्रसाद से सब द्वार खुल जाता है। कविता, संगीत आदि पवित्र तथा सुंदर वस्तुओं के पाने का मार्ग भी तभी खुल जाता है जब वह अपने हृदय की आकांक्षा उदय भूमि बनाने के लिए तैयार हो जाता है। परवाह आकांक्षा स्टील भाव से होनी चाहिए।
संसार वस्तुओं में दोष का दर्शन, ज्ञान का अन्यतम साधन है।इसका अर्थ यह है कि जब तक संसार के विषयों का स्वाद मनुष्य को मीठा लगता है तब तक वह उससे संतुष्ट रहता है आगे बढ़ना नहीं चाहता। परंतु जब हुआ उस मीठी वस्तु को तीखा मारने लगता है, तब उसे ही देने उचे उचे विचार उत्पन्न होते हैं। मानव की वर्तमान दशा का वर्णन भगवत गीता के श्लोक में बड़ी सुंदरता से किया गया है-
कुत्राशिप: श्रुतिसुखा मृगतृष्णारूपा:
क्वेदं कलेवरमशेषरुजां विरोह:।
निर्विद्यते न तू जानो यदपीति विद्वान्
कामानलं मधुलवै: शमयन् दुरापै:।।
कानों को सुख देने वाले संसार एक विषय मृगतृष्णा के समान है। कहां वे और कहां यह शरीर जो, संपूर्ण रोगों के उदय का स्थान है परंतु जिस पर भी इन बातों को भलीभांति जानने पर भी, रानी को संसार में वैराग्य नहीं है। या छोटे-छोटे मीठे मधु के टुकड़ों से अपने काम को आग शांत कर सकता है और समझता है कि किसी प्रकार सब कामनाएं स्वत: शांत हो जाएगी। ऐसी दयनीय स्थिति है। उसका जन्म तो तब होता है जब वह सांसारिक सुखों से वंचित है, अब पवित्रता के कारण दुख पाने लगे।मतलब यह है कि जिसे वह अब तक अपनी प्रिय वस्तु समझता आया है उससे उसे धक्का लगना चाहिए। कभी ऐसी उच्च आकांक्षा का उदय होता है।
ऐसी दशा में मनुष्य में उन्नत होने की इच्छा प्रथम और शिक्षा धन है मनोविज्ञान का यह पक्का नियम है कि जिस वस्तु की जितनी क्या होती है वह वस्तु इतनी जल्दी ही मिलती है। मनुष्य यदि कुछ विषयों की इच्छा तीव्र रूप से करता है तो उसे भी मिल जाता है।अदा उच्च तथा श्रेष्ठ भाव की और हमें अपने मन को पहले झुकाना चाहिए सदा पवित्र विचारों को मन के स्थान दो। गंदे विचारों से बढ़कर अब पवित्रता क्या हो सकती है? विचार ही मनुष्य को पवित्र तथा अपवित्र बनाता है। यदि विचार पवित्र है तो मनीष पवित्र है। यदि विचार अपवित्र है तो मनुष्य अपवित्र है। इससे आगे बढ़ने की पहली सीढ़ी है पवित्र विचारों को जगाना। इस मार्ग का पथिक जीवन में कभी असफल नहीं होता।
मनुष्य को चाहिए कि पहले वह अपने अपराधों को समझें और अपनी बुराई को देखें। कबीर में ऐसे जीवन को भावनाओं को इस दोहे में पूर्णता प्रकट किया है-
बुरा जो देखने में चला, बुरा ना दिखाया कोई।
जो तन देखा अपना, मुझ सा बुरा ना कोई।।
परंतु एक बात ध्यान देने की यह है कि बिना परिश्रम या प्रयत्न किए अध्यात्म की सिद्धि नहीं होती।
'या लोकव्दयसाधनी चतुरता सा चातुरी चातुरी।'
वही चतुरता वास्तव में चतुरता है, जो दोनों लोगों को सिद्ध करने वाली होती है।
जिससे लोक भी सुधरे और परलोक भी सुधरे वही तो चतुरता है। मन में अच्छी भावना का जन्म हुआ, परंतु वह देर तक नहीं टिकती। वह संकुचित और क्षणिक होती है। भावना के हटते ही स्थित फिर उसी खंदक में जा गिरता है। पवित्रताएं पुराने अभ्यास से उसे चारों ओर से घेर लेती है।इसलिए अध्यात्म पथ के पथिक को अपने प्रयत्न को निरंतर नूतन बनाये रखने की आवश्यकता है।
मिस कर दिया है कि मनुष्य को सदा सोचते रहना चाहिए कि 'कोऽहं का च में शक्ति:' अर्थात मैं कौन हूं? मेरा रूप क्या है तथा मेरी शक्ति क्या है? ऐसा जागरूक व्यक्ति ही आगे बढ़ने का अधिकार होता है और आगे पढ़कर वह अपने लक्ष्य को पा लेता है। जो विषकृमि के सामान भी सहयोग में ही आनंद मनाया करता है, वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए मनुष्य को अपनी वर्तमान दशा में दोषो को देखकर दिव्य जीवन, दिव्य आनंद, शाश्वत सुख के लिए निरंतर प्रयत्न करना चाहिए। याद रखो- 'महान भावयन् महान भवति' बड़े की भावना करने से मनुष्य महान बनता है फलत: यह भावना लक्ष्य पर पहुंचने वाली आरंभ की सीढ़ी है।
- १.अध्यात्मिक- इसका अर्थ है आत्मामा (अर्थात शरीर) से संबंध रखने वाला दुख। शरीर तथा मन से संबंध होने पर यहीी दो प्रकार का हो जाता है। शरीर दुख है व्याधि तथा मानस दुख है आधी (जैसे चिंता, क्रोध आदि)। इन दोनों से संबंंध दुखों प्रकार का प्रभेद का अंत नहीं है। मनुष्य को कभी कोई रोग सताया करता है तो कभी कोई। 'शरीरं व्याधि मंदिरम्' की लोकोक्ति प्रसिद्ध है।
- २. आधिभौतिक- इसका अर्थ भूतों अर्थात बाहरी पदार्थों से उन्नत होने वाला दुख। जैसेेेेे सांप यह बिच्छू का काटना; चोरों के द्वारा लाठी से आघात आदि की गणना इस प्रकार में की जाएगी।
- ३. आधिदैविक- अधिदेेव जैसे भूत-प्रेतादि अमानव जीवन के कारण उत्पन्न दुख। इन तीनों प्रकार के दुखों के अनंत विवेद है। इस दुख हो से बचनेे तथा सुख पाने के लिए प्राणी सदा सचेेेे्ष्ट रहता है। उसकी समग्र क्रिया का, कार्यकलापों का एक ही उद्देश्य रहता है कि वह इसी प्रकार सुख के उपलब्धि करें तथा जीवन को सुख पूर्वक बिताएं। परंतु यह कभी भी संभव नहीं है। सुख दुख केेेे साथ हमेशा मिश्रण ही ही मिलता है। फलत: सुख से ध्यान हटाकर दुख की निवृत्ति कीी ओर ही ध्यान देना हमारा कर्तव्य है। परंतु दुख की निवृत्ति हो जाने पर वह दुख पुनः उत्पन्न ना हो। दुख से पार पाने में सांख्य दर्शन पथ प्रदर्शन का कार्य करता है।
-"दु:खत्रयाभिघातात जिज्ञासा तदपघातके हेतौ
दृृृृृष्टे साऽपार्था चेत् नैकांतात्य यश्रन्तोऽभावात्।
इस महत्वपूर्ण कार्य का का आशय है कि तीनों (अध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) दु:खो के अभीघात से मनुष्य को उन दुखोंं के दूर करने वाले कारणों के जानने की इच्छा होती है। इस दुःखों को दूर करने के लिए तथा निश्चित रूप सेे नष्ट करने के लिए दर्शन शास्त्र की आवश्यकता पड़ती है।
हमारे अपूर्ण जीवन को पूर्णत्व की कोटि में पहुंचा देना दर्शन का वास्तविक उद्देश्य है।भारतीय दर्शन की समस्याओं को अध्यात्म से संबंध समस्याओं को भलीभांति समझा जा सकता है। प्रत्येक साधक अपने जीवन को पूर्ण बनाने का इच्छुक होता है।
हृदय में पूर्णत्व की आकांक्षा का उदय तभी होता है जब मनुष्य को अपने अपूर्णता का ज्ञान होता है, और उसने ज्ञानो उद्दीपन की इच्छा प्रकट होती है तब तक वह अपने को अपूर्ण नहीं जानता, तब तक पूर्ण हो जाने की इच्छा का उदय ही नहीं होता। इसलिए श्रीमद भगवत गीता में ज्ञान के साधनों के बीच 'जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम्' को ज्ञान ही मानता है अर्थात जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग दुखदायी होता है और उसमें दोस्त भरा हुआ है, इस बात का बारंबार विचार करना भी ज्ञान रूप ही है। जब तक इसमें दुख का ज्ञान नहीं होता, तब तक यथार्थ सुख पाने की इच्छा का उदय नहीं होता।
भूतों की इच्छा तथा पूर्णत्व तत्व की आकांक्षा में महान अंतर है। इसका सांसारिक वस्तुओं, स्वार्थ निष्ठ अधिकार, अपना प्रभुत्व तथा इंद्र जय भोग विलास की चाह है।
यदि मनुष्य अपने वास्तविक उन्नति चाहता है तो उसके ह्रदय में पूर्णत्व की आकांक्षा की दीपशिखा जल्दी ही चाहिए। पंखों से रहित पक्षी उड़ नहीं सकते, उसी प्रकार पूर्णत्व की आकांक्षा के बिना मनुष्य ना तो अपने को कुछ बना सकता है, ना विषय वासनाओं का विजय प्राप्त कर सकता है। वह सम्मानित रानी के समान अपनी इंद्रियों का दास तथा विषयों के अधीन बना रहता है और निर्बल होने के कारण हुआ घटनाओं की परिवर्तन धारा में इधर-उधर भटकता रहता है।
पूर्णत्व की आकांक्षा से संपन्न मानव की स्पष्ट पहचान है।अपनी सोच दशा से असंतोष तथा उच्च बनने की चाह जिस प्रकार प्रबुद्ध ही मानो आगे बढ़ना चाहता है, निंद्रा से जाग कर अपने को ज्ञान के मार्ग पर बढ़ते हुए पाता है उसी प्रकार इस आकांक्षा वाला मनुष्य भी अपनी वर्तमान हिंन दीन दशा की बुराई से परिचित हो जाता है। और चाहता है कि वह श्रेष्ठतम स्थिति को पार करें। इस प्रकार की आकांक्षा करने से मनुष्य को कल्पनातीत विलक्षण पर प्राप्त होता है। कठिन से कठिन वस्तु उसके लिए सुलभ बन जाती है। वास्तविक उन्नति का मार्ग खुल जाता है उसके ह्रदय में दिव्य ज्ञान का तथा प्रसाद से सब द्वार खुल जाता है। कविता, संगीत आदि पवित्र तथा सुंदर वस्तुओं के पाने का मार्ग भी तभी खुल जाता है जब वह अपने हृदय की आकांक्षा उदय भूमि बनाने के लिए तैयार हो जाता है। परवाह आकांक्षा स्टील भाव से होनी चाहिए।
संसार वस्तुओं में दोष का दर्शन, ज्ञान का अन्यतम साधन है।इसका अर्थ यह है कि जब तक संसार के विषयों का स्वाद मनुष्य को मीठा लगता है तब तक वह उससे संतुष्ट रहता है आगे बढ़ना नहीं चाहता। परंतु जब हुआ उस मीठी वस्तु को तीखा मारने लगता है, तब उसे ही देने उचे उचे विचार उत्पन्न होते हैं। मानव की वर्तमान दशा का वर्णन भगवत गीता के श्लोक में बड़ी सुंदरता से किया गया है-
कुत्राशिप: श्रुतिसुखा मृगतृष्णारूपा:
क्वेदं कलेवरमशेषरुजां विरोह:।
निर्विद्यते न तू जानो यदपीति विद्वान्
कामानलं मधुलवै: शमयन् दुरापै:।।
कानों को सुख देने वाले संसार एक विषय मृगतृष्णा के समान है। कहां वे और कहां यह शरीर जो, संपूर्ण रोगों के उदय का स्थान है परंतु जिस पर भी इन बातों को भलीभांति जानने पर भी, रानी को संसार में वैराग्य नहीं है। या छोटे-छोटे मीठे मधु के टुकड़ों से अपने काम को आग शांत कर सकता है और समझता है कि किसी प्रकार सब कामनाएं स्वत: शांत हो जाएगी। ऐसी दयनीय स्थिति है। उसका जन्म तो तब होता है जब वह सांसारिक सुखों से वंचित है, अब पवित्रता के कारण दुख पाने लगे।मतलब यह है कि जिसे वह अब तक अपनी प्रिय वस्तु समझता आया है उससे उसे धक्का लगना चाहिए। कभी ऐसी उच्च आकांक्षा का उदय होता है।
ऐसी दशा में मनुष्य में उन्नत होने की इच्छा प्रथम और शिक्षा धन है मनोविज्ञान का यह पक्का नियम है कि जिस वस्तु की जितनी क्या होती है वह वस्तु इतनी जल्दी ही मिलती है। मनुष्य यदि कुछ विषयों की इच्छा तीव्र रूप से करता है तो उसे भी मिल जाता है।अदा उच्च तथा श्रेष्ठ भाव की और हमें अपने मन को पहले झुकाना चाहिए सदा पवित्र विचारों को मन के स्थान दो। गंदे विचारों से बढ़कर अब पवित्रता क्या हो सकती है? विचार ही मनुष्य को पवित्र तथा अपवित्र बनाता है। यदि विचार पवित्र है तो मनीष पवित्र है। यदि विचार अपवित्र है तो मनुष्य अपवित्र है। इससे आगे बढ़ने की पहली सीढ़ी है पवित्र विचारों को जगाना। इस मार्ग का पथिक जीवन में कभी असफल नहीं होता।
मनुष्य को चाहिए कि पहले वह अपने अपराधों को समझें और अपनी बुराई को देखें। कबीर में ऐसे जीवन को भावनाओं को इस दोहे में पूर्णता प्रकट किया है-
बुरा जो देखने में चला, बुरा ना दिखाया कोई।
जो तन देखा अपना, मुझ सा बुरा ना कोई।।
परंतु एक बात ध्यान देने की यह है कि बिना परिश्रम या प्रयत्न किए अध्यात्म की सिद्धि नहीं होती।
'या लोकव्दयसाधनी चतुरता सा चातुरी चातुरी।'
वही चतुरता वास्तव में चतुरता है, जो दोनों लोगों को सिद्ध करने वाली होती है।
जिससे लोक भी सुधरे और परलोक भी सुधरे वही तो चतुरता है। मन में अच्छी भावना का जन्म हुआ, परंतु वह देर तक नहीं टिकती। वह संकुचित और क्षणिक होती है। भावना के हटते ही स्थित फिर उसी खंदक में जा गिरता है। पवित्रताएं पुराने अभ्यास से उसे चारों ओर से घेर लेती है।इसलिए अध्यात्म पथ के पथिक को अपने प्रयत्न को निरंतर नूतन बनाये रखने की आवश्यकता है।
मिस कर दिया है कि मनुष्य को सदा सोचते रहना चाहिए कि 'कोऽहं का च में शक्ति:' अर्थात मैं कौन हूं? मेरा रूप क्या है तथा मेरी शक्ति क्या है? ऐसा जागरूक व्यक्ति ही आगे बढ़ने का अधिकार होता है और आगे पढ़कर वह अपने लक्ष्य को पा लेता है। जो विषकृमि के सामान भी सहयोग में ही आनंद मनाया करता है, वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए मनुष्य को अपनी वर्तमान दशा में दोषो को देखकर दिव्य जीवन, दिव्य आनंद, शाश्वत सुख के लिए निरंतर प्रयत्न करना चाहिए। याद रखो- 'महान भावयन् महान भवति' बड़े की भावना करने से मनुष्य महान बनता है फलत: यह भावना लक्ष्य पर पहुंचने वाली आरंभ की सीढ़ी है।

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