महाकाव्य
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महाकाव्य का उद्भाव
'कव्य' शब्द का अर्थ है- 'कवी के कर्म' (कवे: कर्म काव्यम्)। कवि शब्द 'कु' अथवा 'कव्' धातुु से बना है। जिसका अर्थ है- ध्वनि करना, विवरण देना, चित्रण करना इत्यादि। तदनुसार, शब्दों के द्वारा किसी विषय का आकर्षक विवरण देना या चित्रण करना काव्य है। इस साहित्य विधा का उद्भव वैदिक सुखो से ही मिलता है। जिसमेंं स्तुतिपरक नाराशंसियों, दान स्तुतियों, संवाद सुक्तों तथा देवताओंं के वर्णनों का महत्व काव्यात्मक शैली के लिए है। रामायण और महाभारत जैसे आकर्षक काव्य इस साहित्य विधा के भास्कर हैं जिन्होंने प्ररवृत्ति काव्यों में विषय वस्तुुुु, वर्णन विधि, तथा भाषा शैली भी दी है। कालिदास, अश्वघोष आदि कवि ही रामायण से प्रभावित हुए।
वाल्मीकि से कवि की रचना तक आने में काव्य कला को कई शताब्दियां लगी। इस बीच में अनेक कवि हुए, अनेक काव्य कृतियां रची गई किंतु वह भारतीय परिवेश की उस्मा में धीरे-धीरे विलीन हो गई। जिस प्रकार कोई कभी अपनी अभ्यास अवस्था की रचनाओं की उपेक्षा करके उसे शीर्षक मात्र का या एकाध स्फुट पंक्तियों का स्मरण रखता है उसी प्रकार इन शताब्दियों में लिखी गई कविताएं भी परवर्ती युवाओं में स्मरने मात्र रह गई। सुभाषित संग्रहों में या परवर्ती काव्यशास्त्रीय ग्रंथों में कुछ पद्य या कवियों के नाम स्मरण किए गए हैं। यह कहना कठिन है कि प्रसिद्ध परिवर्तित कवियों की रचना मैं उन अज्ञात प्राचीन कवियों की लुप्त रचनाओं का शब्दानुकरण या अर्थ अनुकरण हुआ है या नहीं।
यह निर्देश होता है कि ईसा पूर्व की शताब्दियों में ही पाणिनी,वररूचि तथा पतंजलि व्याकरण होने के अतिरिक्त कवि भी थे जिसकी चर्चा प्रवृत्ति साहित्य ग्रंथों में है। पाणिनि
ने 'पाताल विजय' तथा 'जाम्बवतीजय' नामक दो महाकाव्य लिखे थेे किंतु यह निश्चित नहीं कि ये दोनों पृथक काव्य थे या एक ही काव्य है के 2 नाम थे। राजशेखर के नाम से यह पद जल्हण रचित 'सूक्ति मुक्तावली' में उद्धृत है-
नमः पाणिनीये तस्मै यास्मादाविरभूदिह।
आदौ व्याकरणं काव्यमनु जाम्वबतीजयम्।।
पतंजलि ने महाभाष्य में काव्य साहित्य की बहुमूल्य संपदा का उल्लेख किया है। जिसमें 150 ईसा पूर्व में वर्तमान काव्य रचना की स्थिति का अनुमान है। 'वाररूच्च काव्य' के अतिरिक्तत उन्होंने 'वासवदत्ता', 'सुमनोत्तरा' और 'भैमरथी' आख्यायिकाओं का, 'कंस वध' और 'बलिबंध' नाट्य रचनाओं का एवं अरे ऐसे पदों का निर्देश किया है। जिसमें स्तुतिपरक, प्रेम विषयक या उपदेशात्मा भी सहयोग का उपनिबंधन काव्यशैली में है। लौकिक छंदों का प्रयोग किया है। कील हॉल के इन शब्दों के आधार पर पतंजलि के काल के साहित्य परिवेश की प्रशंसा की है।
इस विवेचन से स्पष्ट है कि रामायण के युग के बाद संस्कृत काव्य धारा लौकिक काव्य का रूप लेने की दिशा में बहुत आगे बढ़ रही थी। पिंगलमुनि के छंद: सूत्र में अनेक लौकिक छंदों की व्याख्या की गई है। जिसके नाम साहित्यिक सौंदर्य से अनुप्राणित हैं। कुछ नाम छंदों की स्वत: प्रवृत्ति, लय तथा गति पर आधृत हैं- मंदाक्रांता, द्रुतविलंबित, वेगवती आदि। कुछ नाम पशु पक्षियों की चेष्टा पर आश्रित हैं- शार्दुलवीक्रिडित, अश्वललित, हिरनीप्लूता आदि। कुछ नामों में सुंदरियों के अभीधान अड़्कित हैं जैसे- तन्वी, रुचिरा, प्रेमदा, मालिनी आदि। जर्मन विद्वान याकोबी ने कहा है कि इन छंदों का ईसा पूर्व उद्भव संस्कृत काव्य की निरंतरता एवं प्राचीनता का घोतक है।
ने 'पाताल विजय' तथा 'जाम्बवतीजय' नामक दो महाकाव्य लिखे थेे किंतु यह निश्चित नहीं कि ये दोनों पृथक काव्य थे या एक ही काव्य है के 2 नाम थे। राजशेखर के नाम से यह पद जल्हण रचित 'सूक्ति मुक्तावली' में उद्धृत है-
नमः पाणिनीये तस्मै यास्मादाविरभूदिह।
आदौ व्याकरणं काव्यमनु जाम्वबतीजयम्।।
पतंजलि ने महाभाष्य में काव्य साहित्य की बहुमूल्य संपदा का उल्लेख किया है। जिसमें 150 ईसा पूर्व में वर्तमान काव्य रचना की स्थिति का अनुमान है। 'वाररूच्च काव्य' के अतिरिक्तत उन्होंने 'वासवदत्ता', 'सुमनोत्तरा' और 'भैमरथी' आख्यायिकाओं का, 'कंस वध' और 'बलिबंध' नाट्य रचनाओं का एवं अरे ऐसे पदों का निर्देश किया है। जिसमें स्तुतिपरक, प्रेम विषयक या उपदेशात्मा भी सहयोग का उपनिबंधन काव्यशैली में है। लौकिक छंदों का प्रयोग किया है। कील हॉल के इन शब्दों के आधार पर पतंजलि के काल के साहित्य परिवेश की प्रशंसा की है।
इस विवेचन से स्पष्ट है कि रामायण के युग के बाद संस्कृत काव्य धारा लौकिक काव्य का रूप लेने की दिशा में बहुत आगे बढ़ रही थी। पिंगलमुनि के छंद: सूत्र में अनेक लौकिक छंदों की व्याख्या की गई है। जिसके नाम साहित्यिक सौंदर्य से अनुप्राणित हैं। कुछ नाम छंदों की स्वत: प्रवृत्ति, लय तथा गति पर आधृत हैं- मंदाक्रांता, द्रुतविलंबित, वेगवती आदि। कुछ नाम पशु पक्षियों की चेष्टा पर आश्रित हैं- शार्दुलवीक्रिडित, अश्वललित, हिरनीप्लूता आदि। कुछ नामों में सुंदरियों के अभीधान अड़्कित हैं जैसे- तन्वी, रुचिरा, प्रेमदा, मालिनी आदि। जर्मन विद्वान याकोबी ने कहा है कि इन छंदों का ईसा पूर्व उद्भव संस्कृत काव्य की निरंतरता एवं प्राचीनता का घोतक है।

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