भारतीय दर्शन क्या है
Sanskrit upsc topic)
भारतीय दर्शन मुख्यतया दो भागों में विभक्त है-१. नास्तिक दर्शन।२.आस्तिक दर्शन। ईश्वर को न मानने वाला नास्तिक और ईश्वर को मानने वाला आस्तिक माना जाता है। पाणिनि के अनुसार परलोक कि सत्ता में न विश्वास रखने वाला नास्तिक कहलाता है। नास्तिक वेद निंदक-अर्थात नास्तिक वही है जो व्यक्ति की निंदाा करता है, वेद के प्रमाण में विश्वास नहीं करता और इसलिए वेद द्वारा प्रतिपादित धर्म, अचार तथा विचार में श्रद्धा्धा नहीं रखता। नास्तिक दर्शन के अंतर्गत 3 दार्शनिक धाराएं स्वीकृत की जाती है१. चार्वाक दर्शन २. जैन दर्शन ३. बौद्ध दर्शन। ये तीनों ही वेदों के अक्षुण्ण प्रमाण में विश्वास नहीं रखते और ना वेद प्रतिपाद्य यज्ञ याग के अनुष्ठान को मानव जीवन के लिए श्रेय धन मानतेे हैं। चार्वाक दर्शन उद्भावक बृहस्पति नामक कोई आचार्य थे। आज बृहस्पति-प्रणित कतिपय सूत्र(बृहस्पति सूत्र) ही इस दर्शन की प्राचीन मौलिकन निधि है। जैैैैैैैन दर्शन का इतिहास बड़ा लंबा है। इस धर्म के प्रतिष्ठाक आचार्य 'तीर्थंकर'के नाम से प्रख्यात हैं। जो सांख्या में 24
है। इसके मौलिक 'अंग' के नाम से विख्यात है। तथा इसमें निहित बीजों का विपुुुल विकास मध्ययुगी जैन दर्शनको के तर्क बहुल ग्रंथों में उपलब्ध है। जैन धर्म अहिंसा का पक्ष पाती हैं- 'अहिंसा परमो धर्मा:' उसका मुख्य धार्मिक मंत्र है। फलता वह विश्वास करता है ईश्वर में,ना वेद में और नावेद द्वारा प्रतिपादित हिंसा बहुत जगह अनुष्ठान में। जैन दर्शन के नास्तिकता का यही कारण है, बौद्ध धर्म के प्रतिष्ठापन कचरे सिद्धार्थ गौतम बुध
को जाता है, जो इतिहास प्रसिद्ध पुरुष थे इस धर्म का मूल ग्रंथ 'त्रिपिटक' है।- सुत्त पिटक, विनय पिटक, अभिधम्म पिटकप। इन पिता को मैं विशेषता अंतिम बैठक में बौद्ध धर्म का दार्शनिक आधार बड़ी प्रोड़ता के साथ प्रतिपादित किया गया है। इसकी चार दार्शनिक धाराएं कालांतर में प्रसिद्ध हुए १. वैभाशिक २ स्रोत तांत्रिक,३.योगोचार तथा ४. माध्यमिक। ऐतिहासिक दृष्टि से बौद्ध धर्म का उदय जैन धर्म के अनंत माना जाता है। बौद्ध धर्म भी जैन धर्म के समान ही वेद कमाने का घोर विरोधी है फलता: वह भी नास्तिक दर्शन के श्रेणी के अंतर्गत आता है इस प्रकार के तीन दर्शन नासिक दर्शन के नाम से प्रख्यात हैं। आस्तिक नआस्तिक दर्श संख्या में भी पर्याप्त मतभेद है परंतु सामान्य रीति में छः प्रकार का माना जाता है।१. न्याय २.वैशेषिक ३.सांख्य ४. योग ५.कर्म मीमांसा ६. वेदांत। इनकी तीन श्रेणियां बनाई गई है। न्याय वैशेषिक प्रथम श्रेणी प्रतिपादक है। सांख्य,योग दूसरा तथा मीमांसा वेद तीसरा का। इन छह दर्शनों के विकास का क्रम प्राया सम्मान रूप रखता है। सबसे प्राचीन वे ग्रंथ है, जो शुद्ध रूप में निबंध है यह सूत्र ग्रंथ सतत दर्शन के आज कल आरंभिक ग्रंथ भले ही माने जाए। परंतु इन ग्रंथों से इन दर्शनों का आरंभ नहीं होता। न्याय न्याय दर्शन के सूत्रों के रचयिता हैं-अक्षपाद गौतम, भाष्य कार हैं वात्स्यायन तथा वर्तिककार-उद्योतकर। वैशेषिक दर्शन के सूत्र कार हैं-कणाद; भाष्यकार है प्रशस्तपाद तथा व्याख्या कार है शंकर मिश्र। सांख्य दर्शन के सूत्रकार है कपिल, भाष्यकार है विज्ञान भिक्षु तथा वृताकार है अनिरुद्ध।ईश्वर कृष्ण की 'संख्याकारिक' को संख्या का एक स्वतंत्र ग्रंथ मानना चाहिए। योग दर्शन के सूत्रकार है पतंजलि
,भाष्यकार हैं व्यास,वर्तिककार है विज्ञान भिक्षु, वृत्तिकार है भोजराज। मीमांसा के सूत्र कार हैं जैमिनी, भाष्यकार हैं शबरमुनि,वर्तिककार है कुमारिल, वृताकार हैं प्रभाकर, निबंधकार है शालिक नाथ तथा माधवाचार्य। वेदांत के सूत्र कार है वादरामायण व्यास, भाष्यकार है नाना मतों के व्यास का अनेक आचार्य, जिसमें शंकराचार्य, रामानुज, निंबार्क, माधव, बल्लभ प्रमुख है।वृतिकार विभिन्न मतों मैं अनेक है।
है। इसके मौलिक 'अंग' के नाम से विख्यात है। तथा इसमें निहित बीजों का विपुुुल विकास मध्ययुगी जैन दर्शनको के तर्क बहुल ग्रंथों में उपलब्ध है। जैन धर्म अहिंसा का पक्ष पाती हैं- 'अहिंसा परमो धर्मा:' उसका मुख्य धार्मिक मंत्र है। फलता वह विश्वास करता है ईश्वर में,ना वेद में और नावेद द्वारा प्रतिपादित हिंसा बहुत जगह अनुष्ठान में। जैन दर्शन के नास्तिकता का यही कारण है, बौद्ध धर्म के प्रतिष्ठापन कचरे सिद्धार्थ गौतम बुध
को जाता है, जो इतिहास प्रसिद्ध पुरुष थे इस धर्म का मूल ग्रंथ 'त्रिपिटक' है।- सुत्त पिटक, विनय पिटक, अभिधम्म पिटकप। इन पिता को मैं विशेषता अंतिम बैठक में बौद्ध धर्म का दार्शनिक आधार बड़ी प्रोड़ता के साथ प्रतिपादित किया गया है। इसकी चार दार्शनिक धाराएं कालांतर में प्रसिद्ध हुए १. वैभाशिक २ स्रोत तांत्रिक,३.योगोचार तथा ४. माध्यमिक। ऐतिहासिक दृष्टि से बौद्ध धर्म का उदय जैन धर्म के अनंत माना जाता है। बौद्ध धर्म भी जैन धर्म के समान ही वेद कमाने का घोर विरोधी है फलता: वह भी नास्तिक दर्शन के श्रेणी के अंतर्गत आता है इस प्रकार के तीन दर्शन नासिक दर्शन के नाम से प्रख्यात हैं। आस्तिक नआस्तिक दर्श संख्या में भी पर्याप्त मतभेद है परंतु सामान्य रीति में छः प्रकार का माना जाता है।१. न्याय २.वैशेषिक ३.सांख्य ४. योग ५.कर्म मीमांसा ६. वेदांत। इनकी तीन श्रेणियां बनाई गई है। न्याय वैशेषिक प्रथम श्रेणी प्रतिपादक है। सांख्य,योग दूसरा तथा मीमांसा वेद तीसरा का। इन छह दर्शनों के विकास का क्रम प्राया सम्मान रूप रखता है। सबसे प्राचीन वे ग्रंथ है, जो शुद्ध रूप में निबंध है यह सूत्र ग्रंथ सतत दर्शन के आज कल आरंभिक ग्रंथ भले ही माने जाए। परंतु इन ग्रंथों से इन दर्शनों का आरंभ नहीं होता। न्याय न्याय दर्शन के सूत्रों के रचयिता हैं-अक्षपाद गौतम, भाष्य कार हैं वात्स्यायन तथा वर्तिककार-उद्योतकर। वैशेषिक दर्शन के सूत्र कार हैं-कणाद; भाष्यकार है प्रशस्तपाद तथा व्याख्या कार है शंकर मिश्र। सांख्य दर्शन के सूत्रकार है कपिल, भाष्यकार है विज्ञान भिक्षु तथा वृताकार है अनिरुद्ध।ईश्वर कृष्ण की 'संख्याकारिक' को संख्या का एक स्वतंत्र ग्रंथ मानना चाहिए। योग दर्शन के सूत्रकार है पतंजलि
,भाष्यकार हैं व्यास,वर्तिककार है विज्ञान भिक्षु, वृत्तिकार है भोजराज। मीमांसा के सूत्र कार हैं जैमिनी, भाष्यकार हैं शबरमुनि,वर्तिककार है कुमारिल, वृताकार हैं प्रभाकर, निबंधकार है शालिक नाथ तथा माधवाचार्य। वेदांत के सूत्र कार है वादरामायण व्यास, भाष्यकार है नाना मतों के व्यास का अनेक आचार्य, जिसमें शंकराचार्य, रामानुज, निंबार्क, माधव, बल्लभ प्रमुख है।वृतिकार विभिन्न मतों मैं अनेक है।



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