Indian geography notes for UPSC
Day 1
भारत की संरचना
परिचय
किसी देश की भूगर्भिक संरचना हमें बातों की समझ में सहायता करती है, जैसे-चट्टानों के प्रकार,उसके चरित्र तथा ढलान, मृदा के भौतिक तथा रासायनिक विशेषताएं, खनिजों की उपलब्धता पृष्ठ एवं भूमिगत जल संसाधनों की जानकारी इत्यादि। इन सभी संसाधनों का किसी देश प्रदेश के लोगों के सामाजिक आर्थिक विकास का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
भूगर्भिक रूप से, भारतीय उपमहाद्वीप, गोंडवाना लैंड अर्थात दक्षणी महाद्वीप का भाग था। भारत का भूगर्भिक इतिहास अनूठा है। भूपटल की उत्पत्ति को समय से ही, भारतीय पुराने प्रायव्दीप का एक भाग अल्पाइन पर्वतोत्पत्ति के उपरांत तृतीयक काल में हिमालय पर्वत का उत्थान आरंभ हुआ है। और प्लीस्टोसीन युग में उतरी भारत के मैदान की उत्पत्ति आरंभ हुई। गंगा के मैदान के निचले भाग जैसे हुगली नदी के बेसिन का अवसादो के द्वारा आज की उत्थान हो रहाा है। भारत का भूगर्भिक इतिहास से जटिल है। भूपटल की उत्पत्ति के साथ ही इसमें भारत के चट्टानोंं की रचना अध्यारोपण के फल स्वरुप है।
आर्कियन शैल समूह
आर्कीयनम महाकल्प को प्रीकैंब्रियन युग भी कहा जाता है। प्रीकैंब्रियन युग पृथ्वी के इतिहास का सबसे पुराना युग है। पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व माना जाता है। पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर लगभग 57 करोड वर्ष पूर्व तक अर्थात कैंब्रियन युग तक के समय को पैलोजोइक युग कहा जाता है।
पृथ्वी की इतिहास का 86.7 प्रतिशत समय प्रीकैंब्रियन युग माना जाता है। आर्यन शब्दावली का उपयोग सबसे पहले 1782 मैं J. D. Dana ने किया था। विश्व की सबसे पुरानी चट्टान को आर्कीयन शैल आ जाता है। वायुमंडल की उत्पत्ति कीमोसिंथेसिस एवं फोटोसिंथेसिस जिन पर आधारित है। इसी युग की में उत्पन्न हुए। आर्कीयन युग की चट्टानों में जीवाश्म नहीं पाए जाते अर्थात इस युग में जीवन नहीं था। आर्कीयन चट्टानों में क्रिस्टलों की भरमार होती है तथा तथा उसमें भारी भ्रंस एवं विकृत मोड पाए जाते हैं। इन चट्टानों में प्लूटोनी अंतर्वेध पाया जाता है। इस प्रकार की चट्टानों का आधार संश्लिष्ट अथवा मौलिक नाइस कहते हैं। इस प्रकार विश्व की सबसे बलिदान पर्वत और पठार की तलहटी में आर्कीयन चट्टाने पाई जाती है।
भारतीय उपमहाद्वीप को चट्टानों के भूगर्भीय इतिहास के लिए टी. एस. हालैंड ने एक विशेष भूगर्भिक समय मापक तैयार किया था। इस समय मापक के अनुसार भारतीय चट्टानों को (i) आर्कीयन (ii) पुराणिक (iii) द्राविडियन आर्य युगों में विभाजित किया था। इस भूगर्भिक समय माप के अनुसार अरावली, धारवाड़, कडप्पाह, विंध्यन, मेघालय पठार तथा निकर की कहानियां आर्कीयन युग की बनी हुई है। इसको आर्कीयन नाम से भी जाना जाता है। इन चट्टानों में विशेष रुप से ग्रेनाइट से लेकर गैब्रो तक की चट्टाने पाई जाती है । इसमें पाए जाने वाले खनिजों में अर्थकलेज, ओलीगोकलेज, कुवटिज, मास्कोवाइट, , और हार्नबलेन्ड सम्मिलित है। भारतीय प्रायद्वीप के लगभग दो तिहाई भाग पर आर्कीयन शैल फैली हुई है। हिमालय पर्वत माला जास्कर, लद्दाख, काराकोरम, तथा अरुणाचल के पर्वतों के नीचे भी आर्यन चट्टान फैली है।
भारतीय प्रायद्वीप में फैली हुई आर्कीयन अर्जुन चट्टानों को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया गया है।
क) बंगाल नाइस
ख) बुंदेलखंड नाइस
ख) नीलगिरी नाइस
धारवाल तंत्र अथवा प्रोटेरोजोइक संघटन
इस भूगर्भिक समय काल का वितरण 25 100 मिलियन वर्ष पूर्व से लेकर 1800 मिलीयन वर्ष पूर्व तक है। भारत की प्रथम रूपांतरित चट्टानें हैं, जो भारत भूगर्भिक समय सारणी में धारवाड तंत्र के नाम से जानी जाती है। भारत में इसका रतन अध्ययन प्रोफेसरD.N वाडीस ने कर्नाटक के धारवाड़ल जिले में किया था। इसका निर्माण ज्यादातर अग्नेय, निक्षेप, शिष्ठ और नाइस से हुई है। धारवाड़ चटाने मूलत: तीन बिखरे हुए क्षेत्रों में पाई जाती है।
१. कर्नाटक के धरवाड़ और बेल्लारी जिले मैं जहां से इसका विस्तार तमिलनाडु के निर्णय ली तथा मदुरई जिले तक हुआ है।
२.छोटा नागपुर पठार के मध्य और पूर्व हिस्से मेघालय पठार तथा मिकिर पहाड़ियां।
धारवाड़ चट्टानों में उच्च उपस्थित है।इसमें लौह अयस्क, मैग्नीशिता, जस्ता, सोना, चांदी, डोलोमाइट, अभ्रक, तांबा, टंगस्टन, निकेल बहुमूल्य पत्थरों और निम्न पदार्थ की प्रचुरता है। धरवाड़ प्रणाली की कुछ महत्वपूर्ण श्रेणीयां निम्न प्रकार है।
१. चैंपियंस रेनिंग
२ चंपानेर श्रेणी
३. चिल्पी श्रेणी
४. क्लोजपेट श्रेणी
५. लौह अयस्क श्रेणी
६. रीयालो श्रेणी
७. सकोलो श्रेणी
८. सौसर श्रेणी
विंध्यन तंत्र
इसका नाम विंध्य पर्वत से हुआ है। यह पर्वत माला गंगा के मैदान और दक्कन के पठार के बीच एक विभाजक रेखा बनाती है। विंध्या तंत्र प्रणाली राजस्थान के चित्तौड़ से लेकर बिहार के सासाराम तक 103,600 वर्ग किलोमीटर के बड़े भाग में फैला हुुआ है ।इसमेंअवसादी निक्षेपों की बहुलता है जो कई स्थानों पर 4000 मीटर से भी अधिक मोटा है। कई क्षेत्रों विंध्यन चट्टानों दक्कन लावा केेेेे नीचे दबी पड़ी है। ग्रेट बाउंडरी फाल्ट विंध्यन पर्वत को अरावली पर्वत से लगभग 800 किलोमीटर की दूरी तक एक दूसरे से विलग करता है।
विंध्यन तंत्र लाल बालू पत्थर, भवन निर्माण संबंधी चट्टाने, सजावटी पत्थर, संश्लिष्ट, हीरा युक्त लौह अयस्क तथा सीमेंट, चूना पत्थर ग्लास और रसायन उद्योग के कच्चे माल की उपलब्धता के लिए प्रसिद्ध है। कई जगहों पर इन चट्टानों में निम्न कोटि के लो एक और मैंने सेट की उपस्थिति है।पन्ना और गोलकुंडा में प्रसिद्ध हीरा की खाने भी विंध्या तंत्र में ही स्थित है। कुतुब मीनार, हुमायूं का मकबरा, फतेहपुर सिकरी, आगरा किला, जमा मस्जिद, दिल्ली का बिरला मंदिर,सांची का बौद्ध स्तूप इत्यादि ऐतिहासिक और प्रसिद्ध इमारतों का निर्माण विंध्यनटेंथ के लाल बालू पत्थरों से हुआ है। सघन बालू पत्थरों का उपयोग पत्थरों की पिसाई करने वाले पत्थरों के रूप में किया गया है।विंध्यन तंत्र की प्रमुख श्रेणियां निम्न है:-
१. भेंडर श्रेणी
२. बिजवार श्रेणी
३. कैमूर श्रेणी
पूराजीवी समूह ( कैंब्रियन से कार्बनिफेरस काल तक)
पूरा जीवी महाकल्प के अंतर्गत मानव भूगर्भिक समय मापक्रम के कई कर आते हैं। यथा - ओर्डोविशन, सिलूरियन, डेवोनी, कार्बनी और पर्मियन। भारतीय भुगत इस समय माफ क्रम में इसे द्रविड़ महाकल्प के नाम से जाना जाता है।
पूरा जीव महाकल्प की अवधि 570 मीडियम वर्ष से 24.5 मिलियन वर्ष पूर्व तक मानी गई है इस महाकल्प में ही पृथ्वी पर जीवन के प्रथम संकेत मिले हैं। मध्य प्रदेश के रीवा जिले के उमरिया के आसपास को छोड़कर इस काल के शैल समूह प्रायद्वीपीय भारत में लगभग अनुपस्थित हैं इस क्रम की चट्टानों का विस्तार हमें जम्मू कश्मीर के पीर पंजाल द्वारा लीदर घाटी, हिमाचल प्रदेश के स्पीति,कांगड़ा, शिमला,तथा उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमायूं क्षेत्रों में मिलते हैं।इसी महाकल्प में पेन्जिया का विभाजन हुआ तथा टेथिस सागर अस्तित्व में आया। सेल बालू पत्थर मृतिका, वक्वार्टज, फ्लैट नमक तथा खड़िया मिट्टी इत्यादि कैंब्रियन चट्टाने है।
भारतीय भूगर्भिक समय माफ क्रम में पूरा जीवनी तंत्र :
गोंडवाना क्रम नदीय और सरवरिय प्रकृति का है। इसका निर्माण प्रवल कार्बनिक काल एवं जुरासिक काल में नदी बेसिनों और झीलों में हुए निक्षेपण से हुआ है। बाद में इसका भ्रंशों के सहारे,गोंडवाना लैंड नामक महान दक्षिणी महाद्वीप के प्राचीन चट्टानों में ध्वंस आरंभ हुआ। इन चट्टानों का निर्माण प्रवल कार्बनिक और जुरासिक काल में हुआ।
मेसोजोइक महाकाल्प गोंडवाना तंत्र
मेसोजोइक का अर्थ है 'मध्य जीवन'। भूगर्भिक समय माफ क्रम की वह अवधि, जिस में चट्टानों में अकशेरुकी जीवाश्मोका वर्चस्व मिलता है उसे मेसोजोइकश से सूचित किया जाता है।मेसोजोइक महाकाल के अंतर्गत 3 उप महाकल्प आते हैं।
१. ट्रैइऐसिक २. जुरासिक और ३. क्रिटेशन
भारतीय भूगर्भिक समय माइक्रम के अनुसार यह अवधि प्रवर कार्बनिकाल से लेकर कैनोजोइक के प्रारंभ तक माना जाता है। गोंडवाना तंत्र की प्रमुख श्रेणी या निर्णय है-
१. तलचर श्रेणी- गोंडवाना सुरेंद्र के श्रेणी का नामकरण उड़ीसा के धनकेनाल जिला के तलचर नामक स्थान से हुआ है इस श्रेणी में अच्छी गुणवत्ता वाले कोयले की प्रचुरता है इन्हें और ताप विद्युत संयंत्रों में उपयोग में लाया जाता है।
२. दामुदा श्रेणी- दामुदा श्रेणी मध्य गोंडवाना युग की है, जिसमें कोयले निक्षेप की परतें प्रचुरता में पाई जाती हैं। इन कोयले की परतों की मोटाई और फैलाव पश्चिम की अपेक्षा पूर्व में अधिक है।इन श्रेणी का कोयला क्षेत्र काफी विस्तृत है। जो झारखंड के दामोदर बेसिन में रानीगंज झरिया, करणपुरा, बोकारो, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के सिंगरौली, कोरबा, पेंच घाटी मध्य प्रदेश के सतपुड़ा बेसिन में सिंगरौली तथा उड़ीसा के महानदी बेसिन के जलचर में पाए जाते हैं । झिंगुर्दा कोयला पर्वत, जिसकी मोटाई 131 मीटर है, इसी श्रेणी में यह भारत की सबसे मोटी कोयला परत है।गोंडवाना क्रम की चट्टाने कश्मीर हिमालय प्रदेश तथा पूर्वांचल जैसे हिमालय क्षेत्र में पाई जाती है। इन क्षेत्रों की कोयला पढ़ते रूपांतरित है। गोंडवाना क्रम की चट्टाने सौराष्ट्र, कच्छ, पश्चिमी राजस्थान, कोरोमंडल तट तथा राजमहल की पहाड़ी में पाई जाती है।
३. पंछट श्रेणी- यह अवर गोंडवाना प्रणाली की सबसे नवीन श्रेणी है, जिसका नामकरण रानीगंज के दक्षिण स्थित पंछट पहाड़ी से हुआ है। इस श्रेणी में हरे रंगलिया हुआ बालू पत्थर और साल की प्रचुरता है इस श्रेणी में कोयला की प्रति नहीं पाई जाती है।
अवर गोंडवाना प्रणाली के लौह अयस्क शैलों का विशेषकर पश्चिम बंगाल के रानीगंज कोयला क्षेत्र में अच्छा विस्तार है। लेकिन इसमें सिडेराइट और निमोनाइटिस जैसे निम्न कोटि के लोएस्ट ही पाए जाते हैं। निम्न कोटि के होने के कारण इन लोएस को खा लो उत्पादन के लिए उत्खनन नहीं किया जाता है।गोंडवाना प्रणाली की चट्टानों से भारत के 95% कोयला की प्राप्ति होती है।इसके अतिरिक्त इनसे लौह अयस्क, चुना पत्थर, बालू पत्थर और चीनी मिट्टी उद्योग के कच्चे मालो की आपूर्ति भी होती है। भारत का सर्वोत्तम कोयला और इसका सर्वाधिक भंडार गोडवाना प्रणाली में हीं पाई जाती है। जो मुख्यतः पश्चिम बंगाल के दामोदर घाटी, झारखंड, उड़ीसा के महानदी घाटी, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश के गोदावरी घाटी और मध्य प्रदेश के सतपुड़ा बेसिन में विस्तृत हैं।
जैसे कि ऊपर कहा गयाा है कि प्रवर कार्बनीकाल को आर्य काल कहा गयाा है। आर्य काल की बनावट प्रमुख विशेषताएं निम्न प्रकार है:- १. प्रवर कार्बनीतालमेल हिमालय पर्वत के स्थान पर एक वृहद भू अभिनति था जो पूरक में चीीन होते हुए प्रशांत महासागर और पश्चिम मैं अफगानिस्तान ईरान और लघु एशिया होते हुए अंंधमहासागर तथा वर्तमान भूमध्य सागर से जुड़ा था।
२. कश्मीर हिमालय क्षेत्र में तीव्र ज्वालामुखी गतिविधियां हुई।
३. गोंडवाना लैंड के ऊपरी भाग में कई दरारें बड़ी और इसके टूटे हुए भाग एक दूसरे से विलग होने लगे।भारतीय उपमहाद्वीप का उत्तर और उत्तर पूर्व की ओर विस्थापन हुआ जो अंतत: एशियाई भूखंड से टकराया।
४. दक्कन ट्रैप में बड़े पैमाने का लावा उद्गार हुए।
५.अरब सागर और बंगाल की खाड़ी का विकास सीमांकन एवं विस्तार हुआ।
६. तृतीयक पर्वत निर्माण युग में हिमालय की उत्पत्ति हुई।
७.भारतीय उपमहाद्वीप को वर्तमान आकृति प्राप्त हुई।
८.अभीनूतन काल में हिम युग का प्रारंभ हुआ जिसमें पृथ्वी के एक बहुत बड़े भाग पर बर्फ की परत जमी।
९. मानव का उद्भव तथा विश्व के विभिन्न हिस्सों में इसका प्रभाव हुआ।
क्रीटेशस तंत्र (दक्कन ट्रैप)
क्रीटेशस उपमहाद्वीप का विस्तार लगभग 146 मीडियम वर्ष पूर्व से 65 मिलियन वर्ष पूर्व तक माना जाता है। क्रीटेशस शब्दावली की उत्पत्ति लेटिन भाषा के 'क्रेटा' से हुआ है जिसका अर्थ है खड़िया। यह भारत के वृहद रूप से वितरित तंत्र है। जिसके विविध संरक्षण निक्षेप देश के विभिन्न भागों में विद्यमान है। इस काल में सागरों का भूखंडों पर अतिक्रमण हुआ और उच्च लावा उदगार से दक्कन ट्रैप का निर्माण हुआ। दक्कन ट्रैप में पता नहीं चलता नो 'ग्रैबो' और ग्रेनाइट के रूप में स्पष्ट अंतर्भेदन दिखता है।
क्रीटेशस युग के अंत में प्रदीप क्षेत्र में भारी ज्वालामुखी उद्गार हुए। इस अवधि में बेसाल्टिक लावा का उच्च स्तरीय उद्गार हुआ, जिसने सतह पर 3000 मीटर से अधिक मोटाई की परत बनाई। लावा पठार इसी लावा प्रवाह का परिणाम है। दक्कन लावा लगभग 500000 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जिसका विस्तार गुजरात के कच्छ और काठवाड़ा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा उत्तर पश्चिम कर्नाटक तक है।
भारत के लावा पठार की अधिकतम मोटाई मुंबई तट के सहारे मिलती है। जहांं से पूरब और पश्चिम दिशाओं में यह मोटाई घटती जाती है। इसके अलावा की मोटाई कच्छ में लगभग 800 मीटर, अमरकंटक में 150 मीटर, बेलगाम कर्नाटक में 60 मीटर है। व्यक्तिगत लावा प्रवाह की औसत मोटाई लगभग 5 मीटर सेेेेे 29 मीटर तक है। महाराष्ट्रर के भुसावल में 'बोरिंग' केेेे अंतर्गत इन लावाइ प्ररवाहों की पहचान की गई है। यह लावा प्रवाह पर्वतों के ऊपर 'अंतर संस्तरीत हैं, जिन्हें अंतर-ट्रैपीयन संंस्तर' कहा जाताा है।
दक्कन ट्रैप के बसाल्ट का उपयोग सड़क एवं भवन निर्माण में क्या जाता है। इसके अतिरिक्त क्वार्टर, बॉक्साइट, मैग्नेटाइट , अगेट तथा अर्ध बहुमूल्य पत्थर भी पाए जाते हैं। यह मैग्निशियम, कार्बोनेट, पोटाश और फास्फेट खनिज में भी धनी है।
तृतीयक तंत्र (कैनोजोइक महाकाल्प)
कैनोजोइक का अर्थ 'नूतन' जीवन। तृतीयक काल का प्रारंभ लगभग 66 मिलीयन वर्ष पूर्व से माना गया है। इस तंत्र की चट्टानों में कई प्रकार के जीवाश्म पाए गए हैं।जो आधुनिक जीवन रूप के काफी पास है, जैसे- स्तनपाई जीव, पौधे और अकशेरूकी जीव।कैनोजोइक महाकाल के अंतर्गत दो उप महाकल्प
१. तृतीय काल २. चतुर्थ काल
प्रीति अकाल में दो महान घटनाएं हैं- पहला गोंडवाना महाद्वीप अंतिम बार टूटा और दूसरा टेथीस भूअभिनति का हिमालय के रूप में उत्थान।विद्या की योग काल के प्रारंभ में भारत का तिब्बत से टकराव हुआ तथा सागरतल में मंद उत्थान के साथ टेथीस बेसिन के निक्षेपित अवसादों का भी उत्थान शुरू हुआ। हिमालय के उत्थान के कारण प्रदीप के पुराने उच्चावच को वितरित कर लिया गया।
हिमालय के उत्थान के तीन स्पष्ट चरण माने जाते हैं-
क) प्रथम चरण जो ओलीगोसीन युग में संपन्न हुआ।
ख) एक जन्म के बाद दूसरा चरण तीव्र संरचना से परिपूर्ण सहा जिसकी अवधि लगभग 45 मिलीयन वर्ष पूर्व की रही- इस काल में लघु हिमालय में वर्णन पढ़े और
ग) तीसरे चरण की अवधि उत्तर प्लियोसीन युग की है। शिवालिक अथवा बाह्य हिमालय का वर्णन पडे।
प्रदीप विभाग में र्टशरी तंत्र की घटना कच्छ, कट्ठीवाड़ा, कुंभकरण, मालाबार, नीलगिरी और पूर्व घाटी के तटीय हिस्सों में घटी।
चतुर्थ महाकल्प की संरचनाएं
चतुर्थ महाकल्प के अवसादो तथा निक्षेप में आधुनिक युग के बहुत से जीवों के जीवाश्म पाए जाते हैं, जिसमें दूध देने वाले जीवों के जीवाश्म भी सम्मिलित है। उत्तरी भारत के मैदान की उत्पत्ति देसी युग में हुई थी।
चतुर्थ महाकल्प में बर्फ की चादरें केवल 1500 मीटर की ऊंचाई तक फैल गई थी। सिंध गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदी के मैदानों का निर्माण भी इसी युग में हुआ था। उत्तरी भारत के मैदानकी तलहट्टी एक महा खंड के समान थी, जिसमें हिमालय से उतरने वाले और विंध्या पर्वत से आने वाली नदियों में अवसाद एवं निक्षेप एकत्रित करके इसको एक समतल मैदान का रूप दिया।
प्लायोस्टोसीन युग में हीम युग आने के कारण इन छात्रों हिम चादरों तथा पर्वतीय हिमनदो का भारी विस्तार हुआ। कश्मीर घाटी और जम्मू की भदरवा घाटी के करेवा निक्षेप भी प्लायोस्टोसीन युग में माने जाते हैं। कश्मीर घाटी में झेलम नदी के दोनों ओर, पीरपंजाब के नीचले ढ़लान पर करेवा पाए जाते हैं। किसी किसी स्थान पर करेवा निक्षेपों की गहराई 1400 मीटर तक पाई जाती है। नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों के चबूतरे भी इस युग के हैं।
करेवा
प्लायोस्टोसीन युग की झीलों मैं एकत्र होने वाले निक्षेपों अवसादो के
करेवा कहते हैं। करेवा निक्षेपों मैं रेत, बालू, दोमट, कांगड़ा, सिल्ट तो तथा बोल्डर इत्यादि का मिश्रण होता हैं। पीर पंजाल की पर्वतमाला के निकले ढ़लानों कर पाए जाते हैं। कश्मीर घाटी का प्रसिद्ध पालमपुर करेवा केसर, बदाम तथा अखरोट की खेती के लिए प्रसिद्ध है। केसर की खेती करने वाले किसानों का जीवन स्तर तुलनात्मक रूप से बेहतर है।






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