काव्यप्रकाश
।। मंगलाचरण ।।
नियतिकृतनियमरहितां हाल्दैकमयीमनन्यपरतंत्राम्। नवरसरुचिरां नर्मितिमादधती भारती कवेर्जयंती।।
अनुवाद:- नियति द्वारा निर्मित नियमों से रहित केवल आनंद मात्र स्वभाव वाली कवि प्रतिभा को छोड़कर अन्य किसी के अधीन ना रहने वाली नौ रसों से युक्त होने से मनोहारिणी काव्य सृष्टि की रचना करने वाली काव्य की भारती (वाणी सरस्वती) सर्वोत्कर्षशालिनी है।
आचार्य मम्मट का काव्य प्रयोजन
काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्य: परनिर्वृत्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।।
अनुवाद:- काव्य यश के लिए, धनार्जन के लिए, व्यवहार ज्ञान के लिए, अमंगल के नाश के लिए, साथ ही आनंद की प्राप्ति के लिए तथा कान्ता (प्रियतमा) के सम्मान उपदेश करने के लिए होता है।
(6 प्रयोजन:- 1. यश 2. अर्थ 3. व्यवहार 4.कल्याण की रक्षा 5.आनंद की प्राप्ति 6.स्त्री के सम्मान उपदेश)
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