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Day 2 (history) भारतीय इतिहास (ancient)

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 (Note-only read remember it. आज इस टॉपिक को ऐसे पढ़ो जो पूरी जिंदगी याद रहे तभी upsc क्लियर हो सकता है।)
भारतीय इतिहास (ancient history)
साक्ष्य के आधार पर इतिहास के प्रकार             
1.प्रागैतिहासिक काल
2. आध्य ऐतिहासिक काल
3. ऐतिहासिक काल

1. प्रोगैऐतिहासिक कालइस काल में मनुष्य के घटनाओं का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिला है केवल पुरातात्विक साक्ष्य है।
 प्रागैतिहासिक काल के जनक 1842AD मैं डॉक्टर प्राइम रोज (अंग्रेज)इसके द्वारा कर्नाटक में रायपुर जिला में लिंगसुगुर नामक स्थान पर पहली बार पाषाण उपकरण खोजे गए थे।
                     पाषाण उपकरण- छुरा , तीर के फलक
1853 AD  में जॉन इविन महोदय द्वारा मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी के तट पर टी0 नरसीपुर पर बड़ी संख्या में पाषाण उपकरण प्राप्त हुए।
 1863 AD रोबोट रोबोट भूवैज्ञानिक जो कुछ समय के जियोलॉजिकल सर्वे क्षण के प्रमुख थे चेन्नई के निकट पल्लवरम में हैंड एक्स (कुल्हाड़ी) उपकण पाया था।

2. आद्य ऐतिहासिक काल- लिखित साक्ष्य नहीं है किंतु पुरातात्विक साक्ष्य है।
3. ऐतिहासिक काललिखित साक्ष्य है और पुरातात्विक साक्ष्य भी है।

               पाषाण काल (5 लाख-6000 वर्ष पूर्व)
     पाषाण काल को  प्रागैतिहासिक काल कहा जाता है।पाषाण युग को इन तीन भागों में बाँटा है।
       पुरापाषाण काल- 
a) निम्न पूरा पाषाण काल 
b) मध्य पूरा पाषाण काल
c) उच्च पूरा पाषाण काल

a) निम्न पाषाण काल-
भारत के विभिन्न भागों से निम्न पूर्व पाषाणकाल से संबन्धित उपकरण प्राप्त होते है ।
इन्हें दो प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है:
(i) चापर- चापिंग पेबुल संस्कृत्ति:
इसके उपकरण सर्वप्रथम पंजाब की सोहन नदी घाटी (पाकिस्तान) में प्राप्त हुए । इसी कारण इसे सोहन-संस्कृति भी कहा गया है । पत्थर के वे टुकड़े, जिनके किनारे पानी के बहाव में रगड़ खाकर चिकने और सपाट हो जाते हैं, पेबुल कहे जाते हैं । इनका आकार-प्रकार गोल-मटोल होता है ।
‘चापर’ बड़े आकार लाला वह उपकरण है जो पैबुल से बनाया जाता है । इसके उपर एक ही ओर फलक निकालकर धार बनाई गयी है । चपिंग उपकरण द्विधारा (Bifacial) होते हैं, अर्थात पेबुल के ऊपर दोनों किनारों को छीलकर उनमें धार बनाई गयी है ।
(ii) हैण्डऐक्य संस्कृति:

इसके उपकरण सर्वप्रथम मद्रास के समीप बहकर तथा अतिरपक्कम से प्राप्त किये गये, ये साधारण पत्थरों से कोर तथा फ्लेक प्रणाली द्वारा निर्मित किये गये है । इस संस्कृति के अन्य उपकरण क्लीवर, स्क्रेपर आदि हैं । भारत के विभिन्न क्षेत्रों से इन दोनों संस्कृतियों के उपकरण प्राप्त किये गये है ।

b) मध्य पाषाण काल- 
इस काल में प्रयुक्त होने वाले उपकरण आकार में बहुत छोटे होते थे, जिन्हें लघु पाषाणोपकरण माइक्रोलिथ कहते थे। पुरापाषाण काल में प्रयुक्त होने वाले कच्चे पदार्थ क्वार्टजाइट के स्थान पर मध्य पाषाण काल में जेस्पर, एगेट, चर्ट और चालसिडनी जैसे पदार्थ प्रयुक्त किये गये। इस समय के प्रस्तर उपकरण राजस्थान, मालवा, गुजरात, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश एवं मैसूर में पाये गये हैं। अभी हाल में ही कुछ अवशेष मिर्जापुर के सिंगरौली, बांदा एवं विन्ध्य क्षेत्र से भी प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाणकालीन मानव अस्थि-पंजर के कुछ अवशेष प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश के सराय नाहर राय तथा महदहा नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाणकालीन जीवन भी शिकार पर अधिक निर्भर था। इस समय तक लोग पशुओं में गाय, बैल, भेड़, घोड़े एवं भैंसों का शिकार करने लगे थे। जीवित व्यक्ति के अपरिवर्तित जैविक गुणसूत्रों के प्रमाणों के आधार पर भारत में मानव का सबसे पहला प्रमाण केरल से मिला है जो सत्तर हज़ार साल पुराना होने की संभावना है। इस व्यक्ति के गुणसूत्र अफ़्रीक़ा के प्राचीन मानव के जैविक गुणसूत्रों (जीन्स) से पूरी तरह मिलते हैं।[1] यह काल वह है जब अफ़्रीक़ा से आदि मानव ने विश्व के अनेक हिस्सों में बसना प्रारम्भ किया जो पचास से सत्तर हज़ार साल पहले का माना जाता है। कृषि संबंधी प्रथम साक्ष्य 'साम्भर' राजस्थान में पौधे बोने का है जो ईसा से सात हज़ार वर्ष पुराना है। 3000 ई. पूर्व तथा 1500 ई. पूर्व के बीच सिंधु घाटी में एक उन्नत सभ्यता वर्तमान थी, जिसके अवशेष मोहन जोदड़ो (मुअन-जो-दाड़ो) और हड़प्पा में मिले हैं। विश्वास किया जाता है कि भारत में आर्यों का प्रवेश बाद में हुआ। वेदों में हमें उस काल की सभ्यता की एक झाँकी मिलती है।मध्य पाषाण काल के अन्तिम चरण में कुछ साक्ष्यों के आधार पर प्रतीत होता है कि लोग कृषि एवं पशुपालन की ओर आकर्षित हो रहे थे इस समय मिली समाधियों से स्पष्ट होता है कि लोग अन्त्येष्टि क्रिया से परिचित थे। मानव अस्थिपंजर के साथ कहीं-कहीं पर कुत्ते के अस्थिपंजर भी मिले है जिनसे प्रतीत होता है कि ये लोग मनुष्य के प्राचीन काल से ही सहचर थे। बागोर और आदमगढ़ में छठी शताब्दी ई.पू. के आस-पास मध्य पाषाण युगीन लोगों द्वारा भेड़े, बकरियाँ रख जाने का साक्ष्य मिलता है।
c) उच्च पाषाण काल- 
यूरोप तथा पश्चिमी एशिया के भागों में मध्य पूर्व पाषाणकाल के पश्चात् उच्चपूर्व पाषाणकालीन संस्कृति का समय आया । इसका प्रधान पाषाणोपकरण ब्लेड (Blade) है । ब्लेड पतले तथा संकरे आकार वाला वह पाषाण फलक है जिसके दोनों किनारे समानान्तर होते है तथा जो लम्बाई में अपनी चौड़ाई से दूना होता है ।
प्रारम्भ में पुराविद् भारतीय प्रागैतिहास में ब्लेड प्रधान काल मानने को तैयार नहीं थे किन्तु बाद में विभिन्न स्थानों से ब्लेड उपकरणों के प्रकाश में आने के परिणाम स्वरूप यह स्वीकार किया गया कि यूरोप तथा पश्चिमी एशिया की भाँति भारत में भी ब्लेड प्रधान उच्च पूर्व पाषाणकाल का अस्तित्व था ।
भारत के जिन स्थानों से उच्च पूर्व पाषाणकाल का उपकरण मिला है उनमें बेलन तथा सोन घाटी (उ॰ प्र॰) सिंहभूमि (बिहार) जोगदहा भीमबेटका, बबुरी, रामपुर, बाघोर (म॰ प्र॰) पटणे , भदणे तथा इनामगाँव (महाराष्ट्र) रेणिगुन्ता, वेमुला, कर्नूल गुफायें (आन्ध्र प्रदेश), शोरापुर दोआब (कर्नाटक) विसदी (गुजरात) तथा बूढ़ा पुष्कर (राजस्थान) का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है ।
इन स्थानों से प्राप्त इस काल के उपकरण मुख्य रूप से ब्लेड पर बने है । इसके साथ-साथ कुछ स्क्रेपर, वेधक, छिद्रक भी मिले है । ब्लेड उपकरण एक विशेष प्रकार के बेलनाकार कोरों से निकाले जाते थे । इनके निर्माण में चर्ट, जेस्पर, फ्लिन्ट आदि बहुमूल्य पत्थरों का उपयोग किया गया है । पाषाण के अतिरिक्त इस काल में हड्डियों के बने हुए कुछ उपकरण भी मिलते है ।
इनमें स्क्रेपर, छिद्रक, बेधक तथा धारदार उपकरण हैं । इलाहावाद के बेलन घाटी में स्थित लोंहदा नाले से मिली हुई अस्थि-निर्मित मातृदेवी की मूर्ति इसी काल की है । भीमबेटका से नीले रंग के कुछ पाषाण खण्ड मिलते है । वाकणकर महोदय के अनुसार इनके द्वारा चित्रकारी के लिये रग तैयार किया जाता होगा ।
सम्भव है विन्ध्य क्षेत्र की शिलाश्रयों में बने हुए कुछ गुहाचित्र उच्चपूर्व पाषणकाल के ही हों । इनसे तत्कालीन मनुष्यों की कलात्मक अभिरुचि भी सूचित होती ही । इस प्रकार भारत में उच्च पूर्व पाषाण काल की अवधि ई.पू. तीस हजार से दस हजार के मध्य निर्धारित की गयी है ।
पूर्व पाषाण कालीन मनुष्य का जीवन पूर्णतया प्राकृतिक था । वे प्रधानत आखेट पर निर्भर करते थे । उनका भोजन मास अथवा कन्दमूल हुआ करता था । अग्नि के प्रयोग से अपरिचित रहने के कारण वे मास कच्चा खाते थे । उनके पास कोई निश्चित निवास-स्थान भी नहीं था तथा उनका जीवन खानावदीश अथवा घुमक्कड था ।

सभ्यता के इस आदिमयुग में मनुष्य कृषि कर्म अथवा पशुपालन से परिचित नहीं था और न ही वह बर्तनों का निर्माण करना जानता था । इस काल का मानव केवल खाद्य-पदार्थों का उपभोक्ता ही था । वह अभी तक उत्पादक नहीं वन सका था । मनुष्य तथा जड़ग्ली जीवों के रहन-सहन में कोई विशेष अन्तर नहीं था ।

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